आदि पर्व
अध्याय
१२६
कर्ण उवाच
रङ्गोऽय़ं सर्वसामान्यः किमत्र तव फल्गुन |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
रचितामिव तस्याद्रेर्मालां विमलपङ्कजाम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
रजः पङ्को न च तमस्तत्रास्ति न जरा नृप ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
रजः प्रवर्तकं तत्स्यात्सततं हारि देहिनाम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
रजः सत्त्वे तथा सक्तं सत्त्वं सक्तं तथात्मनि ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
रजः सन्ध्याभ्रकपिलं दिवाकरपथं यय़ौ ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
रजःसत्त्वसमाय़ुक्तो मनुष्येषूपपद्यते ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
रजतं जातरूपं च मणीनथ च मौक्तिकान् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
रजतं वहु चित्रं च सुवर्णं च मनोरमम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
रजताश्वस्ततः शूरः शैनेय़ः संन्यवर्तत ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
रजश्च महदुद्भूतं शान्तं रुधिरवृष्टिभिः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
रजश्च हि तमश्च त्वा स्पृशतो न जितेन्द्रिय़म् |
१०७ क
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
रजश्चोद्धूय़ सुमहत्पक्षवातेन खेचरः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
रजश्चोद्धूय़मानं तु तमसाच्छादय़ज्जगत् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
रजसश्चापि सत्त्वं स्यात्सत्त्वस्य मिथुनं तमः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
रजसा कीर्यमाणाश्च मन्दीभूताश्च सैनिकाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
रजसा चाप्ययं देही देहवाञ्शव्दवच्चरेत् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
रजसा चाभिभूतानामस्त्रजालैश्च तुद्यताम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
रजसा तमसा चैव मानुषं समभिप्लुतम् ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
रजसा तमसा चैव संवृते भृशदारुणे |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
रजसा तमसा चैव समवस्तीर्णचेतसः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
रजसा तमसा चैव सोमः सोपप्लवो यथा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
रजसा ता विशुध्यन्ते भस्मना भाजनं यथा ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
रजसा तेन सम्पृक्ते भास्करे निष्प्रभीकृते |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
रजसा धर्मय़ुक्तानि कार्याण्यपि समाप्नुय़ात् |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
रजसा ध्वस्तकेशान्तं ददर्श द्रौणिमन्तिके ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
रजसा ध्वस्तपक्ष्मान्तः प्रस्विन्नवदनो भृशम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
रजसा राजसांश्चैव सात्त्विकान्सत्त्वसंश्रय़ात् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
रजसा संवृतं तेन नष्टर्ष्कमभवन्नभः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
रजसा संवृते लोके शरजालसमावृते ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
रजसा साध्यते मोहस्तमसा च नरर्षभ |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
रजसि प्रलय़ं गत्वा कर्मसङ्गिषु जाय़ते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
रजस्तमः सत्त्वमथो तृतीय़ं; गच्छत्यसौ ज्ञानगुणान्विरूपान् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
रजस्तमः सत्त्वमथो येषां निर्धौतमात्मनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
रजस्तमश्च सत्त्वं च त्रय़ एते स्वय़ोनिजाः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
रजस्तमश्च सत्त्वं च विद्धि नाराय़णात्मकम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
रजस्तमश्च हित्वेह न तिर्यग्गतिमाप्नुय़ात् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
रजस्तमश्चाभिभूय़ सत्त्वं भवति भारत |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
रजस्तमसि पर्यस्तं सत्त्वं तमसि संस्थितम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
रजस्तमसि संमग्नं पङ्के द्विपमिवावशम् ||
५८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
रजस्तमोघ्नं यत्कर्म तपसस्तत्स्वलक्षणम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
रजस्तमोभवैर्भावैस्तदप्याहुर्दुरन्वय़म् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तं सत्त्वं निर्मलतामिय़ात् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
रजस्तमोभ्यां रहितं घनैर्मुक्त इवोडुराट् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
रजस्तमोभ्यां संय़ुक्तस्तिर्यग्योनिषु जाय़ते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
रजस्तमोभ्यामाक्रान्ताः फल्गुनस्य वधैषिणः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
रजस्तमोविष्टतनू तावुभौ मधुकैटभौ |
६४ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
रजस्तल्लोकनाशाय़ विहितं मानुषान्प्रति ||
२२ ख