आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
अतुलामाप्नुहि प्रीतिं तत्र तत्र मय़ा सह ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
अतुल्यत्वात्कृतो देवैर्नाम्ना कामस्तु पावकः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
विभाण्डक उवाच
अतुल्यरूपाण्यतिघोरवन्ति; विघ्नं सदा तपसश्चिन्तय़न्ति ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
अतुष्टास्तुष्टवद्राजन्नूषुः परमदुःखिताः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अतुष्यद्भरतश्रेष्ठो भीष्मो धर्मार्थतत्त्ववित् ||
४३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
अतूलपूर्णं गाङ्गेय़स्त्रिभिर्वाणैः समन्वितम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
अतृप्त इव पुत्राणां दाराणां च धनस्य च ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
अतृप्त एव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अतृप्तदर्शना पुत्र दर्शनस्य तवानघ |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
अतृप्ता यान्ति विध्वंसं सन्तोषं यान्ति पण्डिताः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
यय़ातिरु उवाच
अतृप्तो यौवनस्याहं देवय़ान्यां भृगूद्वह |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
अतृप्यंस्तत्र वीराणां हतानां मांसशोणितैः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
अतृप्यन्तस्तु साधूनां य एवागमवुद्धय़ः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
पुत्र उवाच
अतृप्यन्नमृतस्येव कृच्छ्राल्लव्धस्य वान्धवात् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
अतृप्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
अतृप्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
अतो गुह्यतरार्थं तदध्यात्ममतिमानुषम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
अतो ज्ञात्वा समादद्ध्वं यदत्र व्यतिरिच्यते ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
अतो दानपवित्रेण प्रीतोऽस्मि तपसैव च ||
१२ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अतो दुःखतरं किं नु केशव प्रतिभाति मे |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
अतो दृष्टोऽस्मि ते साक्षाद्व्रह्मचर्यं च ते महत् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
अतो दोषं न पश्यामि मा क्रुधस्त्वं प्रलम्वहन् ||
१५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अतो न प्राहरत्तस्मै पुनरेव तवात्मजः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
अतो न वधमिच्छामि धर्मराजस्य कर्हिचित् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२८
धृतराष्ट्र उवाच
अतो नाभ्यनुजानामि गमनं तत्र वः स्वय़म् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
अतो नार्हसि कल्याणि धातारं धर्ममेव च |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
द्रुपद उवाच
अतो नाहं करोम्येवं व्यवसाय़ं क्रिय़ां प्रति |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
अतो नाय़ं शुभो वासस्तुल्ये सदसती इह |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
अतो निय़म्यते लोकः प्रमुह्य धर्मवर्त्मसु |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
अतो भार्गव इत्युक्तं मय़ा गोत्रं तवान्तिके ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
अतो भीतः पलाय़ामि गच्छेय़ं नासुखं सुखात् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
पृथिव्यु उवाच
अतो भूतिरतः कीर्तिरतो वुद्धिः प्रजाय़ते |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
३२
व्रह्मो उवाच
अतो भूय़श्च ते वुद्धिर्धर्मे भवतु सुस्थिरा ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
अतो भय़ं व्यतीतं मे प्रीतिश्च परमा त्वय़ि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
अतो भय़ार्ताः प्रणिपत्य भूय़ः; कृत्वाञ्जलीनुपतिष्ठन्ति शूरान् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
अतो मामेव धर्मज्ञ प्रस्थापय़ितुमर्हसि ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
अतो मृत्युभय़ं नास्ति यावदिच्छा तवाच्युत ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
अतो मे भूय़सी नन्दिर्यदेवमनुपश्यसि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
अतो मे रोचते गन्तुमादित्यं दीप्ततेजसम् |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
अतो मय़ैतद्विहितं तव वीर्यप्रकाशनम् |
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
अतो यन्मन्यते धाता तस्मात्तत्तस्य रोचते ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
अतो यमत्वं तव देव विश्रुतं; निवोध चेमां गिरमीरितां मय़ा ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
अतो राजर्षय़ः सर्वे मृगय़ां यान्ति भारत |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
सनत्कुमार उवाच
अतो राज्ञः प्रधानत्वं शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अतो रात्रिश्च निद्रा च निर्गता दिवसक्षय़े |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
अतो राष्ट्रस्य शान्तिर्हि भूतानामिव वासवात् ||
२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अतो विद्वन्नभिय़ास्यामि पार्थं; दिष्टं न शक्यं व्यतिवर्तितुं वै ||
५४ ख