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वन पर्व
अध्याय ९६
लोमश उवाच
अतो विद्वन्नुपादत्स्व यदत्र वसु मन्यसे ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
अतो विनिहताः सर्वे येऽस्मज्जय़चिकीर्षवः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २८२
सत्यवानु उवाच
अतो विरात्रागमनं नान्यदस्तीह कारणम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
अतो विशिष्टस्त्वधमो गुरुदारप्रधर्षकः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
अतो हास्यतरं लोके किञ्चिदन्यन्न विद्यते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
अतो हि सर्ववर्णानां श्रद्धाय़ज्ञो विधीय़ते |
३९ क
वन पर्व
अध्याय ५८
दमय़न्त्यु उवाच
अतोनिमित्तं शोकं मे वर्धय़स्यमरप्रभ ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
अतोषय़त्पाण्डवेय़ो हुताशं; कृष्णद्वितीय़ोऽतिरथस्तरस्वी |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
अतोऽग्रमादाय़ कुरुष्व भद्रे; वलिं च विप्राय़ च देहि भिक्षाम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
यय़ातिरु उवाच
अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अतोऽन्यं पृतनाशेषं मन्ये कुनदिकामिव |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
अतोऽन्यतरतो हीनादवरो नाम जाय़ते ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
अतोऽन्यथा कृच्छ्रगता भविष्यथ मय़ार्दिताः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
अतोऽन्यथा चेत्क्रिय़ते न हितं नो भविष्यति |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १९६
द्रोण उवाच
अतोऽन्यथा चेत्क्रिय़ते यद्व्रवीमि परं हितम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १९६
कर्ण उवाच
अतोऽन्यथा चेद्विहितं यतमानो न लप्स्यसे ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १
कृष्ण उवाच
अतोऽन्यथा तैरुपचर्यमाणा; हन्युः समेतान्धृतराष्ट्रपुत्रान् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदय़े क्वचित् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
अतोऽन्यथा नरपतिर्भय़मृच्छत्यनुत्तमम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
अतोऽन्यथा नास्ति शान्तिर्नित्यमन्तरमन्ततः |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
अतोऽन्यथा प्रवृत्तानां राक्षसो विधिरुच्यते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
अतोऽन्यथा मनुष्येन्द्र स्वधर्मात्परिहीय़ते ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
अतोऽन्यथा रथिना फल्गुनेन; भीमेन चैवाहवदंशितेन |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
अतोऽन्यथा वर्तमाना भवेद्वाच्या प्रजापतेः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
अतोऽन्यथा वर्तमानाः सर्वे नार्हन्ति सत्क्रिय़ाम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
अतोऽन्यथा वर्तमानो राजा प्राप्नोति किल्विषम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
अतोऽन्यथा वृथामांसमभक्ष्यं मनुरव्रवीत् ||
५० ग
सभा पर्व
अध्याय २०
जरासन्ध उवाच
अतोऽन्यथाचरँल्लोके धर्मज्ञः सन्महाव्रतः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
अतोऽन्यथानुवर्तत्सु तेजसः काल उच्यते ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
माद्र्यु उवाच
अतोऽन्यन्न प्रपश्यामि सन्देष्टव्यं हि किञ्चन ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
अतोऽन्ये त्वतिरिक्ता ये ते वै सङ्करजाः स्मृताः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
अतोऽन्येन प्रकारेण शान्तिरस्य कुतो भवेत् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अतोऽपि भूय़ांश्च गुणैर्धनञ्जय़ः; स चाभिपत्स्यत्यखिलं वचो मम |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
अतोऽर्थकरमप्येतन्न करोम्यद्य ते वचः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
वृहस्पतिरु उवाच
अतोऽस्मि देवेन्द्र विवर्णरूपः; सपत्नो मे वर्धते तन्निशम्य |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
अतोऽहं ताश्च कन्या वै भ्रातुरर्थाय़ भारत |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
अतोऽहमपि वक्ष्यामि हेतुमात्रं निवोधत ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
अत्ता ह्यन्नमिदं विद्वान्पुनर्जनय़तीश्वरः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अत्ति चैव तथैव त्वं सवितुः सदृशो भव ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गौरु उवाच
अत्यक्ताहं त्वय़ा व्रह्मन्न शक्या नय़ितुं वलात् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अत्यक्रामत्स तथा संमतः स्या; न्न संशय़ो नास्ति मनुष्यकारः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यक्रामत्स दुर्गाणि दिवारात्रमतन्द्रितः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
अत्यक्रामद्धार्तराष्ट्रं सा कन्या वरवर्णिनी ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यक्रामन्महाराजो गिरिं चैवान्वपद्यत ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
अत्यजद्भरतश्रेष्ठ त्वचं जीर्णामिवोरगः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
अत्यद्भुतं महाप्राज्ञ रोमहर्षणमर्जुनः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
अत्यद्भुतं रणे कर्म कृतवांस्तत्र पाण्डवः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
अत्यद्भुतमपश्याम शक्रस्येव पराक्रमम् ||
८० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
अत्यद्भुतमहं मन्ये भीमसेनस्य विक्रमम् |
१ क