द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
अत्यर्थमिव सङ्क्रुद्धः प्रतिविद्धे जनार्दने ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
अत्यर्थमुपतिष्ठन्ति तेषां न श्रूय़ते ध्वनिः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
अत्यागश्चाभिमानश्च मोहो मन्युस्तथाक्षमा |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
अत्याज्यमस्य जानामि प्राणैस्तुल्यं धनञ्जय़म् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
अत्याढ्यांश्चातिशूरांश्च व्राह्मणांश्च वहुश्रुतान् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अत्यार्यमतिदातारमतिशूरमतिव्रतम् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
अत्याशित्वमकारुण्यं सुखदुःखोपसेवनम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अत्याश्रमानय़ं सर्वानित्याहुर्वेदनिश्चय़ाः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
अत्यासन्ना हय़ारोहा ऋष्टिभिर्भरतर्षभ |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
अत्याहितं चिन्तय़ित्वा व्यस्मय़न्त पृथग्जनाः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
अत्याहितं दर्शय़न्तो वेदय़न्ति महद्भय़म् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
अत्याहितं वा गूढास्ते पारं वोर्मिमतो गताः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
अत्याय़ं चातिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जय़ेत् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
अत्युक्तमपि मे सर्वं क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अत्युग्रं च प्रपश्यन्ति युद्धमानन्दिनो द्विजाः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अत्युग्रं तेजसां तेजस्तपसां परमं तपः ||
१३ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
अत्युग्रप्रतिपिष्टैश्च नदद्भिश्च भृशातुरैः |
७२ क
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
अत्युष्णमेव त्वरिता तत्क्षणं प्रिय़कारिणी |
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा; योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
अत्येति सर्वदुःखानि दुःखं ह्यन्तवदुच्यते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
अत्र कर्मान्तवचनं कीर्तय़न्ति पुराविदः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र काञ्चनशैलस्य काञ्चनाम्वुवहस्य च |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र कामश्च रोषश्च शैलश्चोमा च सम्वभुः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
अत्र कार्यं समाधत्स्व प्राप्तकालमरिन्दम |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र कैलासमित्युक्तं स्थानमैलविलस्य तत् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
लोमश उवाच
अत्र कौन्तेय़ सहितो भ्रातृभिस्त्वं; सुखोषितः सह विप्रैः प्रतीतः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
अत्र क्रोधविषं पार्थ विमुञ्च चिरसम्भृतम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र गङ्गां महादेवः पतन्तीं गगनाच्च्युताम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
अत्र गत्वा सुखस्यान्तं दुःखस्यान्तं प्रपद्यते ||
१४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
अत्र गाथा पुरा गीता रसातलनिवासिभिः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
अत्र गाथा भूमिगीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
अत्र गाथा यज्ञगीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
अत्र गाथा व्रह्मगीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
अत्र गाथा व्रह्मगीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
अत्र गाथा व्रह्मगीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
अत्र गाथाः कामगीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
अत्र गाथाः कीर्तय़न्ति पुराकल्पविदो जनाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
अत्र गाथाः पुरा गीताः शृणु राज्ञा यय़ातिना |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र गाय़न्तिकाद्वारं रक्षन्ति द्विजसत्तमाः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
अत्र गोव्रतिनो विप्राः स्वाध्याय़ाम्नाय़कर्शिताः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
अत्र चाकुशले जाते स्त्रिय़ो नास्ति व्यतिक्रमः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
अत्र चापि नरव्याघ्र मनो जन्तोर्विधीय़ते |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र चाहं प्रतिवसामीति ||
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र चैतन्महावीर्यं धनुः पार्थस्य गाण्डिवम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र चैत्ररथं रम्यमत्र वैखानसाश्रमः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र ज्योतींषि सर्वाणि विशन्त्यादित्यमण्डलम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र तिष्ठति वै स्वातिरत्रास्या उदय़ः स्मृतः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
अत्र तृप्ता हुतवहाः स्वां योनिमुपभुञ्जते |
१२ क