उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
अत्र नानाविधाकारास्तिमय़ो नैकरूपिणः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
अत्र नानाविधानग्नीन्प्रवक्ष्यामि महाप्रभान् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र नाराय़णः कृष्णो जिष्णुश्चैव नरोत्तमः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अत्र निःश्रेय़सं यन्नस्तद्ध्याय़स्व पितामह |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र नित्यं दिशापालाः साय़ं प्रातर्द्विजर्षभ |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र नित्यं स्रवन्तीनां प्रभवः सागरोदय़ः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
अत्र निर्याणकालेषु तमः सम्प्राप्यते महत् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
अत्र नो मुह्यतां राजन्संशय़ं छेत्तुमर्हसि ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अत्र नो यतमानानां वधश्चेदपि साधु तत् ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र पन्नगराजस्याप्यनन्तस्य निवेशनम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र पश्चात्कृता दैत्या वाय़ुना संय़तास्तदा |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र पश्चादहः सूर्यो विसर्जय़ति भाः स्वय़म् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
अत्र पातालमाश्रित्य वरुणः श्रिय़माप च ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
अत्र पिङ्गलय़ा गीता गाथाः श्रूय़न्ति पार्थिव |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र पीत्वा समस्तान्वै वरुणस्य रसांस्तु षट् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
अत्र पूर्वं वसिष्ठस्य पौराणस्य द्विजर्षभ |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
अत्र प्राणाश्च राज्यं च भावाभावौ सुखासुखे ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
अत्र भूतपतिर्नाम सर्वभूतमहेश्वरः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
अत्र भोगवती नाम पुरी वासुकिपालिता |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र मध्ये समुद्रस्य कवन्धः प्रतिदृश्यते |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
अत्र मन्दरकुञ्जेषु विप्रर्षिसदनेषु च |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र मन्दाकिनी चैव मन्दरश्च द्विजर्षभ ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
अत्र मन्ये समाय़त्तो जय़ो वाजय़ एव वा ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
अत्र मां प्रापय़ क्षिप्रं पश्य मे सारथे वलम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
अत्र मां प्रापय़ क्षिप्रं सारथे यत्र पाण्डवः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अत्र मां प्रापय़ क्षिप्रमश्वांश्चोदय़ सारथे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
अत्र मानं च कौन्तेय़ क्रोधं चैव विवर्जय़ ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
अत्र माय़ासहस्राणि विकुर्वाणा महौजसः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र मूलं हिमवतो मन्दरं याति शाश्वतम् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
अत्र मे भगवन्सम्यक्साचिव्यं कर्तुमर्हसि ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
दमय़न्त्यु उवाच
अत्र मे महती शङ्का भवेदेष नलो नृपः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र मे संशय़श्चैव कौतूहलमतीव च |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
अत्र मे संशय़स्तीव्रो हृदि सम्परिवर्तते |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र यज्ञं समारुह्य ध्रुवं स्थाता पितामहः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र यत्प्रतिपत्तव्यं तन्मे व्रूहि पितामह ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
अगस्त्य उवाच
अत्र यत्प्राप्तकालं नस्तद्व्रूहि वदतां वर |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र यद्धितमस्माकं लोकानां चैव सर्वथा |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
अत्र यन्मन्यसे प्राप्तं तच्छीघ्रं सम्प्रधारय़ ||
२२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अत्र या प्रणिपातेन शान्तिः सैव गरीय़सी ||
६८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
अत्र या मामकी वुद्धिः श्रूय़तां यदि रोचते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
अत्र युक्तो नरो लोकान्यशश्च महदश्नुते ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
अत्र राक्षसजात्यश्च भूतजात्यश्च मातले |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
अत्र राक्षसराजेन पौलस्त्येन महात्मना |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र राक्षसय़क्षाणां गन्धर्वाणां च गालव |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
अत्र राजा महेष्वासो मान्धाताय़जत स्वय़म् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र राज्ञा मरुत्तेन यज्ञेनेष्टं द्विजोत्तम |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
अत्र राज्येन विप्राणां चन्द्रमाश्चाभ्यषिच्यत ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
अत्र लव्धवरैः सोमः सुरैः क्रतुषु पीय़ते ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अत्र लोकत्रय़स्यापस्तिष्ठन्ति वरुणाश्रय़ाः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
अत्र लोकत्रय़स्यास्य पितृपक्षः प्रतिष्ठितः |
२ क