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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
अत्र वत्स्यामि दुर्धर्षो निःसङ्गेनान्तरात्मना ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
अत्र वाय़ुस्तथा वह्निरापः खं चैव गालव |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
अत्र विद्युत्प्रभा नाम जज्ञिरेऽप्सरसो दश ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
नारद उवाच
अत्र विश्रम्य भुक्त्वा च निवर्तिष्याव गालव ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्र विश्वे सदा देवाः पितृभिः सार्धमासते |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र विष्णुः पुरा देवस्तप्तवांस्तप उत्तमम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
अत्र विष्णुपदं नाम क्रमता विष्णुना कृतम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अत्र वुद्ध्या समीक्षस्व किं नु कार्यमनन्तरम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्र वृत्तेन वृत्रोऽपि शक्रशत्रुत्वमीय़िवान् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
अत्र वेदाञ्जगौ पूर्वं भगवाँल्लोकभावनः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ११४
लोमश उवाच
अत्र वै ऋषय़ोऽन्येऽपि पुरा क्रतुभिरीजिरे ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
लोमश उवाच
अत्र वै सततं देवा मुनय़श्च सनातनाः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र वै सम्प्रमूढे तु धर्मे राजर्षिसेविते |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
अत्र वै हिमवत्पृष्ठे नित्यमास्ते महेश्वरः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्र वैतरणी नाम नदी वितरणैर्वृता |
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
वासुदेव उवाच
अत्र वो द्यूतमाय़ातं विजय़ाय़ेतराय़ वा ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्र शक्रधनुर्नाम सूर्याज्जातो महानृषिः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
अर्जुन उवाच
अत्र शङ्कां न पश्यामि तेन शुद्धिर्भविष्यति ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र शान्तनवो भीष्मो रथेऽस्माकं पितामहः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
अत्र श्रेय़श्च भूय़श्च यथा सा वक्तुमर्हति |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
अत्र षाड्गुण्यमाय़त्तं युधिष्ठिर निवोध तत् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
अत्र संय़मनित्यानां सिद्धानां स्वैरचारिणाम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
अत्र सत्यं च धर्मश्च त्वय़ा सम्यक्प्रकीर्तितः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्र सर्वासवः प्राप्ताः पुनर्गच्छन्ति पञ्चधा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
अत्र सर्वे महाराज त्यक्त्वा जीवितमात्मनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
अत्र साध्वनुकम्पां वै कर्तुमर्हसि केवलम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्र सामानि गाथाभिः श्रुत्वा गीतानि रैवतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
अत्र सारस्वतैर्यज्ञैरीजानाः परमर्षय़ः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्र सावर्णिना चैव यवक्रीतात्मजेन च |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्र सिद्धाः शिवा नाम व्राह्मणा वेदपारगाः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
अत्र सूर्यं प्रणय़िनं प्रतिगृह्णाति पर्वतः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
अत्र सूर्यांशुभिर्भिन्नाः पातालतलमाश्रिताः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
अत्र सौगन्धिकवनं नैरृतैरभिरक्ष्यते |
१० क
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
अत्र स्नातः कृतकृत्यो विशुद्ध; स्तीर्थान्यन्यान्यनुसंय़ाहि राजन् ||
२५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अत्र स्नातस्य ते भावो मानुषो विगमिष्यति |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
अत्राद्याहो निवत्स्यामः क्षपां भरतसत्तम |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अत्राध्याय़शतं त्रिंशत्त्रय़ोऽध्याय़ाश्च शव्दिताः ||
२१० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अत्राध्याय़शते द्वे तु सङ्ख्याते परमर्षिणा |
१२८ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अत्राध्याय़ास्त्रय़ः प्रोक्ताः श्लोकानां च शतं तथा |
२३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
अत्रानलसखस्यापि पवनस्य निवेशनम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
अत्रानुवंशं पठतः शृणु मे कुरुनन्दन |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
अत्रानुवंशो भवति ||
८ ग
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
अत्रानुवंशो भवति ||
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
अत्रानुवंशो भवति ||
४७ ग
वन पर्व
अध्याय ११४
लोमश उवाच
अत्रानुवंशो रुद्रस्य तं निवोध युधिष्ठिर ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अत्रान्तरे सुमहत्सूतपुत्र; श्चक्रे युद्धं सोमकान्सम्प्रमृद्नन् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
अत्रापि तत्त्वं परमं शृणु सम्यङ्मय़ेरितम् ||
८० ग
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अत्रापि परिसङ्ख्यातमध्याय़ानां महात्मना ||
१३४ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
अत्रापि विधिरुक्तश्च मुनिभिर्मांसभक्षणे |
११ क