chevron_left  हतान्दुर्योधनोarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
हतान्दुर्योधनो दृष्ट्वा क्षत्तुः सस्मार तद्वचः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
हतान्निहन्मेह नरर्षभेण; वय़ं सुरेशात्मसमुद्भवेन ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
हतान्परिवहन्तश्च यन्त्रिताः परमाय़ुधैः |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
हतान्पुत्रांस्तथा पितॄन्सुहृत्सम्वन्धिवान्धवान् |
४४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
हतान्पुत्रान्महावीर्यान्क्षत्रधर्मपराय़णान् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
हतान्भ्रातॄन्पितॄन्पुत्रान्सुहृत्सम्वन्धिवान्धवान् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
हतान्येकरथेनाजौ कस्तस्य सदृशो रथः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
हतानय़त गृह्णीत युध्यतापि च कृन्तत |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
हतामित्रः कथं सर्वं त्यजेथा वुद्धिलाघवात् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
हतामित्रः प्रय़च्छोर्वीं राज्ञः सद्वीपपत्तनाम् ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
हतामित्राञ्श्रिय़ा युक्तानचिराद्द्रक्ष्यसे पतीन् ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
हतारोहा गजा राजन्हय़ाश्च हतसादिनः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
हतारोहा दिशो राजन्भेजिरे भ्रष्टकम्वलाः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
हतारोहा व्यदृश्यन्त विशृङ्गा इव पर्वताः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
हतारोहाः क्षितौ पेतुर्द्विपाः पार्थशराहताः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
हतारोहान्भिन्नभाण्डान्क्रव्यादगणमोदनान् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
हतारोहाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुः शरातुराः ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
हतारोहाश्च मातङ्गाः पाण्डवेन महात्मना |
७६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
हतावशिष्टांस्तुरगानर्जुनेन महाजवान् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
हतावशेषानुत्सृज्य त्वदीय़ान्कतिचिद्रथान् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
हताविति तय़ोरासीत्सेनय़ोरुभय़ोर्मतिः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
हतावेताविति प्राह सुरानसुरसूदनः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
हताशो ह्यकृतार्थः सन्हतः सम्भावितो नरः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
हताश्च कुरवः सर्वे भीष्मद्रोणपुरःसराः ||
७६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
हताश्च खलिनो यत्र स देशः खलिनोऽभवत् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
हताश्वं च समालक्ष्य हतसूतमरिन्दमम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा दुर्मुखो विमनास्तदा |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा दृष्ट्वा राज्ञस्तु पौरुषम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १४
भीमसेन उवाच
हताश्वं नकुलं दृष्ट्वा वृषसेनेन संय़ुगे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
हताश्वं रथमुत्सृज्य गदां गृह्य महावलः ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
हताश्वं रथमुत्सृज्य त्वरमाणो नरोत्तमः |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
हताश्वं रथमुत्सृज्य विकर्णस्तु महारथः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
हताश्वं रथमुत्सृज्य स तु राजा श्रुताय़ुधः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
हताश्वं विरथं पार्थं पौरुषे पर्यवस्थितम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
हताश्वं सैन्धवं भीतमेकं व्याकुलचेतसम् ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
हताश्वः सहदेवस्य प्रतिपेदे महारथम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
हताश्वमञ्जोगतिभिः सुषेणः; शिनिप्रवीरं निशितैः पृषत्कैः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
हताश्ववीराग्र्यनरेन्द्रनागं; पिपासितं श्रान्तपत्रं भय़ार्तम् ||
५६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
हताश्वसूतं सम्प्रेक्ष्य रथं हेमपरिष्कृतम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
हताश्वसूतमुत्सृज्य रथं स पतितध्वजम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
हताश्वसूतात्स रथादवप्लुत्य महारथः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
हताश्वा हतसूताश्च निश्चेष्टा रथिनस्तदा |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
हताश्वाः पृथिवीं जग्मुस्तत्र तत्र महारथाः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
हताश्वात्तु ततो यानादवप्लुत्य महारथः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
हताश्वात्तु ततो यानादवप्लुत्य महारथः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
हताश्वात्तु रथात्कर्णः समाप्लुत्य विशां पते |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
हताश्वात्तु रथात्तस्मादवप्लुत्य सुतस्तव |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
हताश्वात्तु रथात्तूर्णं वृषकस्य रथं यय़ौ |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
हताश्वात्तु रथात्तूर्णमवतीर्य महाभुजः |
७ क