कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
अकूजनेन चेन्मोक्षो नात्र कूजेत्कथञ्चन ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
अकृच्छ्रात्सुखमाप्नोति सर्वत्र च विराजते ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अकृतं द्रोणभीष्माभ्यां दुष्करं कर्म संय़ुगे |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
अकृतं मुनिभिः पूर्वं किं मय़ैतदनुष्ठितम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अकृतज्ञाश्च मित्राणां ते वै निरय़गामिनः ||
६६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
धुन्धुमार उवाच
अकृतज्ञोऽस्तु मित्राणां शूद्राय़ां तु प्रजाय़तु |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
अकृतप्रज्ञको वालो मोहं गच्छति जापकः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
युधिष्ठिर उवाच
अकृतव्यवसाय़स्य श्रेय़ो व्रूहि पितामह ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
अकृतव्रण शक्यो वै द्रष्टुं वेदविदां वरः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
अकृतव्रणः प्रादुरासीद्रामस्यानुचरः प्रिय़ः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
अकृतव्रणः शुभैर्वाक्यैराश्वासय़दनेकधा ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
अकृतव्रणप्रभृतय़ः काशिकन्या च भारत ||
१६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
अकृतव्रणो जामदग्न्यमिदं वचनमव्रवीत् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अकृता ते मतिस्तात पुनर्वाल्येन मुह्यसे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
अकृता या प्रहस्तेन कुम्भकर्णेन चानघ |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
अकृतात्मानमासाद्य राजानमनय़े रतम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
अकृतार्था ह्यहं भर्त्रा प्रसवार्थश्च मे महान् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
अकृतास्त्रः कृतास्त्रं वै वलवन्तं सुदुर्वलः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अकृतास्त्रक मा योत्सीर्वाल सङ्ग्रामकातर ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
अकृतास्त्रक मा योधीर्वाल सङ्ग्रामकातर ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
राम उवाच
अकृतास्त्रस्य देवेश का शक्तिर्मे महेश्वर |
१४७ क
वन पर्व
अध्याय
२२८
धृतराष्ट्र उवाच
अकृतास्त्रेण पृथिवी जिता वीभत्सुना पुरा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
अकृताह्निकमेवैनं जिघांसुर्जितकाशिनम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
अकृती लभते भ्रष्टः क्षते क्षारावसेचनम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
अकृते कृतमानित्वमज्ञाने ज्ञानमानिता |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
अकृते तु प्रय़त्नेऽस्मानुपावृत्तः कलिर्महान् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
अकृतेनैव कार्येण गतः पार्थानधोक्षजः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
द्रुपद उवाच
अकृतेय़ं तव प्रज्ञा व्रह्मन्नातिसमञ्जसी |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
अकृतेय़ं तव प्रज्ञा व्रह्मन्नातिसमञ्जसी |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
अकृत्रिममसंहार्यं प्राकृतं निरुपस्कृतम् |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
अकृत्वा कर्म यो लोके फलं विन्दति विष्टितः |
१७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
अकृत्वा च पुनर्दुःखं कर्म दृश्येन्महाफलम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
अकृत्वा देवतापूजां नान्यं गच्छेत्कदाचन |
७० ख
वन पर्व
अध्याय
५६
वृहदश्व उवाच
अकृत्वा पादय़ोः शौचं तत्रैनं कलिराविशत् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
अकृत्वा वचनं तात केशवस्य महात्मनः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अकृत्वा वचनं पथ्यं क्षय़ं गच्छन्ति कौरवाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अकृत्वा संविदं काञ्चित्सहसाहमुपप्लुतः |
११९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
अकृत्वा स्वय़माहारं व्रतं तत्सार्वकामिकम् ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
अकृत्वा हृदि तद्राजा तं नृपं सोऽन्ववर्तत ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
अकृशांश्च कृशांश्चक्रुर्हेतुभिः शास्त्रनिश्चितैः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
अकृष्टं वै व्रीहिय़वं नीवारं विघसानि च |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
अकृष्टपच्या पृथिवी आशीर्भिर्वीरुधोऽभवन् |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
अकृष्टपच्या पृथिवी तवैश्वर्ये वभूव ह |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अकृष्टपच्या पृथिवी पुटके पुटके मधु |
१३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
अकृष्टपच्या पृथिवी भवन्त्योषधय़स्तथा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अकृष्टपच्या पृथिवी विवभौ चैत्यमालिनी ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
अकृष्टाश्चैव हंसाश्च ऋषय़ोऽथाग्निय़ोनिजाः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
अकोशस्यासहाय़स्य कुतः स्विद्विजय़ो मम |
२० क