आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
अथ गर्भः स भित्त्वोरुं व्राह्मण्या निर्जगाम ह |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
अथ गर्भावनुप्राप्ते उभे ते वै युधिष्ठिर ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
अथ गव्यं पय़स्तात कदाचित्प्राशितं मय़ा |
७९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
अथ गां मधुपर्कं चाप्युदकं च जनार्दने |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अथ गाण्डीवमुद्यम्य दिव्यं धनुरमर्षणः |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अथ गावल्गणिर्धीमान्समरादेत्य सञ्जय़ः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
अथ गृह्यान्नमत्युष्णं विश्वामित्रोऽभ्युपागमत् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
अथ गोकर्णमासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
अथ घोरं तमस्तीव्रं प्रादुरासीत्समन्ततः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
अथ चन्द्रप्रभां मुष्णन्नादित्यस्य पुरःसरः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अथ चापि सुसन्त्रस्तौ तं दृष्ट्वा घोरदर्शनम् |
११२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मय़ि स्थिरम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
अथ चिन्तां समापेदे पुनः पौरवनन्दन |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
अथ चिन्तां समापेदे स मुनिर्मनुजाधिप |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
अथ चिन्तय़तस्तस्य कर्णाभ्यां पुरुषः सृतः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
अथ चूर्णैश्च गन्धानां नानापुष्पैः प्रिय़ङ्गुभिः |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अथ चेत्कामसंय़ोगाद्द्वेषाल्लोभाच्च लक्ष्यते |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
अथ चेत्तं निहत्याजौ शेषेणाभिसमागताः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
अथ चेत्तप्यसे पापैर्धर्मं चेदनुपश्यसि ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
भगवानु उवाच
अथ चेत्ते प्रवर्तेरन्मय़ि किञ्चिदसाम्प्रतम् |
८७ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अथ चेत्त्वमविज्ञाय़ इदं कर्म करिष्यसि |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
अथ चेत्पौरुषं किञ्चित्क्षत्रिय़ात्मनि पश्यसि |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
अथ चेत्प्रतिगृह्णीय़ुर्दद्यादहरहर्नृपः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
युधिष्ठिर उवाच
अथ चेत्सर्वतः क्षत्रं प्रदुष्येद्व्राह्मणान्प्रति |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
अथ चेत्साहरेच्छुल्कं क्रीता शुल्कप्रदस्य सा |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
अथ चेदन्यथा कुर्याद्यदि कामाद्युधिष्ठिर |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
मातो उवाच
अथ चेदपि दीर्णः स्यान्नैव वर्तेत दीर्णवत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
अथ चेदभिवर्तेत राज्यार्थी वलवत्तरः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
अथ चेदवधो धर्मो धर्मः को जातु चिद्भवेत् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
अथ चेदवभोत्स्यन्ति हंस्ये मत्स्यानपि ध्रुवम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
अथ चेदात्मभाग्येषु नान्येषां सिद्धिमश्नुते |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
अथ चेदिपतेर्माता राज्ञश्चान्तःपुरात्तदा |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
अथ चेदीदृशीं वृत्तिं क्लीवामभ्युपपद्यसे ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
अथ चेदेवमप्यस्ति यल्लोके नोपपद्यते |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
अथ चेद्दुष्टवुद्धिस्त्वं सर्वैर्धर्मैर्विवर्जितः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
अथ चेद्धर्मतो युध्येद्धर्मेणैव निवारय़ेत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
अथ चेद्रोचय़ेदेतद्द्रुह्येत मनसा तथा |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
अथ चेद्वुद्धिजं कृत्वा व्रूय़ुस्ते तदवुद्धिजम् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
अथ चेद्वेदवित्सर्वैः पङ्क्तिदोषैर्विवर्जितः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
अथ चेन्निरय़ात्तस्मात्समुत्तरति कर्हिचित् |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
अथ चेन्मन्यसे चैकं कारणं किं भवेदिति |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
अथ चेन्मन्यसे श्रेय़ो न मे भेदो भवेदिति |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
अथ चेन्मन्यसे सिद्धिमस्मदर्थेषु नित्यदा |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
अथ चेन्मां न जानासि सूर्यस्येवोद्यतः प्रभाम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
अथ चेन्मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
युधिष्ठिर उवाच
अथ चेमे महाप्राज्ञ शेरते हि गतासवः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
अथ चेल्लङ्घय़ेदेनां मर्यादां क्षत्रिय़व्रुवः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
अथ चेल्लाभसमय़े स्थितिर्धर्मेऽपि शोभना ||
२३ ख