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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
विराटश्च महाराज सैन्धवं वाहिनीमुखे |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
विराटश्च शिखण्डी च शैशुपालिश्च दंशिताः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्तत्र सङ्ग्रामे हत्वा पञ्चशतान्रथान् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
विराटस्तु ततः पश्चात्स्वेन सैन्येन संवृतः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
विराटस्तु सहानीकः सहसेनं जय़द्रथम् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्य तु कैकेय़ी भार्या परमसंमता |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्य दुहितरमुत्तरां नामाभिमन्युरुपय़ेमे |
९० क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्य पुराभ्याशे दूता जय़मघोषय़न् ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
विराटस्य प्रिय़ो भ्राता शतानीको निपातितः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्य प्रिय़ो भ्राता शतानीकोऽभ्यहारय़त् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्य रथानीकं मत्स्यस्यामित्रघातिनः |
६७ क
विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्य सभां गत्वा भूमिपालासनेष्वथ |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्य सुतां पूर्वं स्नुषां गाण्डीवधन्वनः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
विराटस्य सुतो ज्येष्ठो वीरः शङ्खोऽभ्यहारय़त् ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
विराटेन तु मत्स्येन वल्यर्थं हेममालिनाम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
विराटेनोत्तरा दत्ता स्नुषा यत्र किरीटिनः |
१३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
विराटो दशभिर्भल्लैराजघान परन्तप |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
विराटो द्रुपदश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ |
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
विराटो द्रुपदश्चैव याज्ञसेनिश्च पञ्चभिः ||
१२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
विराटो द्रुपदश्चैव शिखण्डी च महारथः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
विराटो धृष्टकेतुश्च केकय़ाश्च महारथाः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
विराटो भगदत्तेन शरवर्षेण ताडितः |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
विराटोऽथ त्रिभिर्वाणैर्भीष्ममार्छन्महारथम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
विरात्रे चागतं कस्मात्कोऽनुवन्धश्च तेऽभवत् ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
विरात्रे प्रमथिष्यामि पशोरिव शिरो वलात् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
विराद्धिश्चैव राद्धिश्च कार्याकार्ये वलावले ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
विरावः श्रूय़ते ह स्म समुद्रस्येव मथ्यतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
विरिक्तस्य यथा सम्यग्घृतं भवति भेषजम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
विरिच्यमानोऽप्यतिरिच्यमानो; विद्यात्कविः सुकृतं मे दधाति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
विरिञ्च इति यः प्रोक्तः कपिलज्ञानचिन्तकैः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
विरुद्धानि हि शास्त्राणि पश्यन्तीहाल्पवुद्धय़ः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
विरुद्धे योनिसंसर्गे कथं च तपसा युतः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
विरुवन्तो महारावान्विनेशुः सर्वतो हताः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
विरूढशष्पा पृथिवी मत्तदंशसरीसृपा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
विरूप किं धारय़ते भवानस्य वदस्व मे |
८९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
भीष्म उवाच
विरूपं रूपमास्थाय़ प्रश्नं पप्रच्छ शम्वरम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
विरूपं रूपवन्तं वा पुमानित्येव भुञ्जते ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
व्यास उवाच
विरूपतां मे सहतामेतदस्याः परं व्रतम् ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
विरूपरूपः पिङ्गाक्षः करालो घोरदर्शनः |
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
विरूपाक्ष इति ख्यातः सखा मम महावलः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
विरूपाक्षं दशभुजं तिष्यगोवृषभध्वजम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २९७
वैशम्पाय़न उवाच
विरूपाक्षं महाकाय़ं यक्षं तालसमुच्छ्रय़म् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्णं विभीषणम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
विरूपाक्षस्तु दैतेय़श्चित्रय़ोधी महासुरः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
विरूपाक्षेण सुग्रीवस्तारेण च निखर्वटः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
विरूपाश्वेन निमिना जनकेन च धीमता ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
विरूपेभ्योऽल्पवुद्धिभ्यो लिप्समाना धनागमम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
विरूपो यावदादर्शे नात्मनः पश्यते मुखम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
विरूपो रूपवांश्चैव युवा वृद्धस्तथैव च ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
विरेजतुर्महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ ||
१६ ख