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आदि पर्व
अध्याय १०
डुण्डुभ उवाच
अहं पुरा रुरो नाम्ना ऋषिरासं सहस्रपात् |
७ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
अहं पूर्वमगस्त्येन क्रुद्धेन परमर्षिणा |
४७ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अहं पूर्वमहं पूर्वं द्रक्ष्यामि वृषभध्वजम् |
१२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
अहं पूर्वमहं पूर्वमिति क्षत्रिय़पुङ्गवाः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अहं पूर्वमहं पूर्वमिति न्यघ्नन्सहस्रशः ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतुः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
व्यास उवाच
अहं पैलोऽथ कौन्तेय़ याज्ञवल्क्यस्तथैव च |
३ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
अहं प्रजापतिर्व्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते |
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४४
व्रह्मो उवाच
अहं प्रजापतीनां च सर्वेषां नात्र संशय़ः |
११ क
वन पर्व
अध्याय २१३
कन्यो उवाच
अहं प्रजापतेः कन्या देवसेनेति विश्रुता |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अहं प्रवेक्ष्ये शिविरं चरिष्यामि च कालवत् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
अहं प्रसादजस्तस्य कस्मिंश्चित्कारणान्तरे |
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
अहं प्रसादजस्तुभ्यं लोकधाम्ने स्वय़म्भुवे |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अहं प्रिय़तमः पुत्रः पितुर्द्रोण महात्मनः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
अहं प्रेष्यश्च दासश्च तवाम्व सुतवत्सले ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५२
व्राह्मण उवाच
अहं भवांश्च भूतानि सर्वे सर्वत्रगाः सदा ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
अहं भित्त्वा प्रवेक्ष्यामि कालपक्वमिदं वलम् |
६७ क
विराट पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
अहं भूमिञ्जय़ो नाम नाम्नाहमपि चोत्तरः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ८८
अष्टक उवाच
अहं मन्ये पूर्वमेकोऽस्मि गन्ता; सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
अहं महाकुले जाता ह्रदाद्ध्रदमिवागता |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
कर्ण उवाच
अहं यदुक्तः परुषं तु किं चि; त्पितामहस्तस्य फलं शृणोतु ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
अहं योत्स्यामि मिषतः संय़ुगे धार्तराष्ट्रजान् |
९१ क
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
अहं यय़ातिर्नहुषस्य पुत्रः; पूरोः पिता सर्वभूतावमानात् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
राजो उवाच
अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम् |
५१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
अहं राजानमन्विष्ये भवती विनिवर्तताम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
अहं राजाभवं विप्र तत्र पुत्रशतं मय़ा |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
अहं राज्ञः करिष्यामि रक्षां पुरुषसत्तम ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अहं लक्ष्मीरहं भूतिः श्रीश्चाहं वलसूदन |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अहं वः पाण्डुपुत्रेभ्यस्त्रास्यामीति यदव्रवीत् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
अहं वकः शैवलमत्स्यभक्षो; मय़ा नीताः प्रेतवशं तवानुजाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
अहं वकस्य वै भ्राता किर्मीर इति विश्रुतः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
अहं वक्ता च मन्त्रस्य होता शुक्रस्य चैव ह |
२९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
अहं वनं गमिष्यामि भवान्राज्यं प्रशास्त्विदम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
अहं वनं गमिष्यामि ह्यजिनैः प्रतिवासितः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १४१
भीम उवाच
अहं वहिष्ये पाञ्चालीं यत्र यत्र न शक्ष्यति |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
अहं वा निहतः शेष्ये हनिष्ये वाद्य पाण्डवान् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
अहं वाय़ुः प्रभावं ते दर्शय़ाम्यात्मनो वलम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
अहं विचित्रवीर्याय़ द्वे कन्ये समुदावहम् |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अहं विजानामि यथावदद्य; परोक्षभूतं तव तत्तु शल्य ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अहं विलं प्रवेक्ष्यामि भवाञ्शाखां गमिष्यति ||
९३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
अहं विशिष्टः सर्वेषां भ्रातॄणां दय़ितस्तथा |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अहं विष्णुरहं व्रह्मा शक्रश्चाहं सुराधिपः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
अहं विष्णुरहं व्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्ययः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अहं विय़ुक्तः स्वैर्भाग्यैः पुत्रैश्चैवेह सञ्जय़ |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
अहं वृत्रं वलं पाकं शतमाय़ं विरोचनम् |
४८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
अहं वै कामधुक्तुभ्यमिति तं प्राह वागथ ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
अहं वै कुरुभिर्योत्स्याम्यवजेष्यामि ते पशून् ||
४४ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
अर्जुन उवाच
अहं वै कुरुभिर्योत्स्याम्यवजेष्यामि ते पशून् ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
अहं वै त्वा निधास्यामि यथाशक्ति यथावलम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय २७५
वरुण उवाच
अहं वै त्वां प्रव्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ||
२८ ख