भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
शाकद्वीपस्य सङ्क्षेपो यथावद्भरतर्षभ |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
शाकभक्षश्चीरवासाः कुमारीर्विन्दते दश ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
शाकमूलफलैर्वापि येन वर्तय़ते स्वय़म् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
शाकम्भरीं समासाद्य व्रह्मचारी समाहितः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
शाकम्भरीति विख्याता त्रिषु लोकेषु विश्रुता ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
शाकलं नाम नगरमापगा नाम निम्नगा |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शाकल्यः संशितात्मा वै नव वर्षशतान्यपि |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
शाकवृत्तिः फलैर्वापि कौमारं विन्दते पदम् |
६४ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
शाकाहारस्य यत्सम्यग्वर्षैर्द्वादशभिः फलम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शाकुनिं च ततः षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
शाकुन्तलं महात्मानं दौःषन्तिं भर पौरव ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
शाकुन्तलिं महेष्वासं भूरिद्रविणतेजसम् ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
शाकुन्तलो महावीर्यस्तव पूर्वपितामहः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
शाकेन चान्ये जीवन्ति पश्यास्मानपि जीवतः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
शाको नाम महाराज तस्य द्वीपस्य मध्यगः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
शाखा इवेतरे पार्थाः पाञ्चालाः पत्रसञ्ज्ञिताः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
शाखां शाखां महानद्यः संय़ान्ति सिकतासमाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
शाखाः पञ्चदशेमास्तु विद्या भास्करदर्शिताः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
शाखाः स्कन्धान्प्रशाखाश्च स्वय़मेव व्यशातय़त् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
शाखागतमरिं चान्यदपश्यत्कोटरालय़म् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
शाखानगरमर्हस्तु सहस्रपतिरुत्तमम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
शाखाप्रतानैर्विमलैः सुमहान्स यथा द्रुमः ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
शाखाभिरनुरूपाभिर्भूषितं छत्रसंनिभम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
शाखाभेदाश्च ये केचिद्याश्च शाखासु गीतय़ः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
शाखामास्येन जग्राह तेषामेवान्ववेक्षय़ा |
३ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
शाखामृगगणैश्चैव तापसैश्च समन्वितम् ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
शाखामृगगणैश्चैव सेवितं सुमनोहरम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
शाखाव्याक्षिप्तवदनः पर्यपृच्छत कश्यपम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
शाखाश्च तस्य संश्रित्य वसति स्म सुखं पुरः |
२२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
शाखासहस्रसञ्छन्नं न्यग्रोधं ददृशुस्ततः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
शाखास्वासज्य तस्यैव कृष्णाजिनमरिन्दम |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
शाखाय़ां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णाय़ां नराधिप |
८२ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्य यय़ौ खगः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
शाखिनो वहवश्चापि शाखय़ाभिहतास्तय़ा |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
शाखो यय़ौ च भगवान्वाय़ुमूर्तिर्विभावसुम् |
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
शाखो विशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यम्वुजालः सुनिश्चय़ः ||
९४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
शाड्वलं कदलीस्कन्धमत्र सन्तानका नगाः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
शाणीवालपरीधानो व्याघ्रचर्मपरिच्छदः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
शाण्डिली निभृतं वाक्यं सुमनामिदमव्रवीत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
शाण्डिलीं व्राह्मणीं तत्र ददृशाते तपोन्विताम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
शातकुम्भमय़ं दिव्यं प्रेक्षागारमुपागमत् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
शातकुम्भमय़ं युक्तं साधय़ेद्यानमुत्तमम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
शातकुम्भमय़ापीडो वभौ यूप इवोच्छ्रितः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
शातकुम्भमय़ापीडो वभौ यूप इवोच्छ्रितः ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
शातकुम्भस्य शुद्धस्य शतं निष्कान्ददामि ते |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
शातकौम्भमय़ैः कुम्भैर्माहेय़ैश्चाभिमन्त्रितैः ||
३६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
शातकौम्भैश्च कवचैर्भूषणैश्च तमोऽभ्यगात् ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शातकौम्भ्यः स्रजश्चित्रा विप्रकीर्णाः समन्ततः ||
३९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
शातकौम्भ्या स्रजा भाति कवचेन च भास्वता |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
शातय़ामास समरे तरसा द्रौणिरुत्स्मय़न् ||
१८ ख