वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
जनय़ध्वं सुतान्वीरान्कामरूपवलान्वितान् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
जनय़न्ति च धान्यानि वीजानि विविधानि च |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
जनय़ामास धर्मात्मा पुत्रानेकादशैव तु ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
जनय़ामास पुत्रौ द्वावरुणं गरुडं तथा |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
जनय़ामास भगवान्पुत्रानुत्तमतेजसः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
जनय़ामास यं काली शक्तेः पुत्रात्पराशरात् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
जनय़ामास यं देवी दिव्या त्रिपथगा नदी |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
जनय़ामास विप्रेन्द्र द्वे अण्डे विनता तदा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
जनय़ामास स मुनिर्मेनकाय़ां शकुन्तलाम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
जनय़ामास सन्तापमिन्द्रस्य सुमहातपाः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
जनय़ामासुरुद्वेगं सुमहान्तं दिवौकसाम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
जनय़ित्वा वसूनष्टौ जिता लोकास्त्वय़ाक्षय़ाः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
जनय़िष्यसि पुत्रौ द्वौ वीरौ त्रिभुवनेश्वरौ ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
जनय़िष्याम्यपत्यानि त्वय़्यहं चारुहासिनि ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
जनय़ेद्यं सुतं सोमः सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् ||
३२ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
जनय़ेय़ुर्भय़ं ये स्म त्रैलोक्यस्यापि दर्शनात् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
जपंश्चाभ्युत्थितः शश्वन्निर्मलः स्वर्गमाप्नुय़ात् ||
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
जपञ्शान्तनवो धीमान्कालाकाङ्क्षी स्थितोऽभवत् ||
११२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
जपन्वेदानजपंश्चापि राज; न्समः शूद्रैर्दासवच्चापि भोज्यः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
युधिष्ठिर उवाच
जपस्य च विधिं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि मेऽनघ |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
जपहोमपरान्सिद्धान्ददर्श परवीरहा ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
जपहोमसमाय़ुक्तं स्वां रक्षन्तं महाचमूम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
जपेदुदकशीलः स्यात्पेशलो नातिजल्पनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
कामन्द उवाच
जपेदुदकशीलः स्यात्सुमुखो नान्यदास्थितः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
जपैर्होमैश्च संय़ुक्तो मङ्गलैश्च पृथग्विधैः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
जपैर्होमैश्च संय़ुक्तो व्रह्मत्वं कारय़िष्यति ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
जप्त्वा गुह्यं महावाहुरग्नीनाश्रित्य तस्थिवान् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
उपमन्युरु उवाच
जप्यं च ते प्रदास्यामि येन द्रक्ष्यसि शङ्करम् ||
२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
जप्यं जगौ च सततं नाराय़णमुखोद्गतम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
जप्यं प्रति ममेच्छेय़ं वर्धत्विति पुनः पुनः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
जप्यमावर्तय़ंस्तूष्णीं न च तां किञ्चिदव्रवीत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
धर्म उवाच
जप्यस्य च फलं यत्ते सम्प्राप्तं तच्च मे शृणु ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
जप्यस्य राजशार्दूल कथं ज्ञास्याम्यहं फलम् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
जप्यहोमव्रतैः कृच्छ्रैर्निय़मैर्देहपातनैः |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
जप्यावसानं कार्यार्थं प्रतीक्षन्ती तपस्विनी ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
जप्यैश्च मन्त्रैश्च तथौषधीभिः; समन्ततः स्वस्त्ययनं प्रचक्रुः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
जपय़ज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युताः |
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
जपय़ज्ञान्मनोय़ज्ञांस्त्रिदिवेऽपि चकार सः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
११५
भृगुरु उवाच
जमदग्निं ततः पुत्रं सा जज्ञे काल आगते |
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
जमदग्निः शमं नैव जगाम कुरुनन्दन ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
जमदग्निधेन्वास्ते वत्समानिन्युर्भरतर्षभ |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
जमदग्निरु उवाच
जमदग्निरिति ख्यातमतो मां विद्धि शोभने ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
युधिष्ठिर उवाच
जमदग्निर्महातेजाः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
जमदग्निश्च सप्तैते उदीचीं दिशमाश्रिताः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
जमदग्निसुतो वीरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
जमदग्नेश्च संवादं सूर्यस्य च महात्मनः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
जमदग्नेस्तु चत्वार आसन्पुत्रा महात्मनः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
जमदग्नौ महाभागे तपसा भावितात्मनि |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
जम्भं जिघांसुं प्रगृहीतवज्रं; जय़ाय़ देवेन्द्रमिवोग्रमन्युम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
जम्भकैर्यक्षरक्षोभिः स्रग्विभिः समलङ्कृतः |
७ क