chevron_left  यथोदय़न्वैarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
यथोदय़न्वै गगने सूर्यो हन्ति महत्तमः |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
यथोपजीविनां धेनुर्देवादीनां धरा स्मृता |
५१ क
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन्यथामराः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
यथोपजोषं तैश्चापि समागच्छन्महामुनिः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
यथोपजोषं राजेन्द्र द्विजातिप्रवरस्य सा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
यथोपजोषं सर्वश्च जनश्चिक्रीड भारत ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
यथोपजोषमासीनाः पुनर्द्यूतप्रवृत्तय़े |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
भीष्म उवाच
यथोपदिष्टं भुजगेन्द्रसंश्रय़ं; जगाम काले सुकृतैकनिश्चय़ः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
यथोपदिष्टं मेधावी दर्भादींस्तान्यथातथम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
यथोपदिष्टमाचार्यैः कार्यः पञ्चगुणो रथः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
यथोपदेशं निय़ता वर्तमाना वराङ्गने |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
यथोपदेशं परिकीर्तितासु; नरः प्रजाय़ेत विचार्य वुद्धिमान् |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति प्रोवाच पार्थिवः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
यथोपपत्तिं कुर्वन्ति शक्तिमन्तः कृतव्रताः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
यथोपपन्नं चाहारं तस्मै प्रादाज्जनाधिपः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यथोपलव्धजीवी स्यान्मुनिर्दान्तो जितेन्द्रिय़ः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ७४
शुक्र उवाच
यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
यथोर्णनाभिः परिवर्तमान; स्तन्तुक्षय़े तिष्ठति पात्यमानः |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
यथोल्वेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
श्रीकृष्ण उवाच
यथोवाच पुरा शक्रं महावुद्धिर्वृहस्पतिः ||
९४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
यथोषरे वीजमुप्तं न रोहे; न्न चास्योप्ता प्राप्नुय़ाद्वीजभागम् |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
यथौघः पर्वतश्रेष्ठमासाद्याभिप्रदीर्यते |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
यथौपम्योपदेशेन किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
यदकार्षीत्तदा कर्णः सङ्ग्रामे भीमदर्शने ||
९५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
धृतराष्ट्र उवाच
यदकार्षीद्रणे क्रुद्धस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
यदकार्षुर्नृपतय़स्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति; विशन्ति यद्यतय़ो वीतरागाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
यदक्षरमथाव्यक्तमीशं लोकस्य भावनम् |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यदक्षय़ं महार्घं च तद्व्रूहि वदतां वर ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय ७३
केशिन्यु उवाच
यदग्निमपि संस्पृश्य नैव दह्यत्यसौ शुभे ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यदग्निहोत्रे सुहुते साय़म्प्रातर्भवेत्फलम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २२३
सारिसृक्व उवाच
यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतय़ः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यदग्रे चानुवन्धे च सुखं मोहनमात्मनः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
यदघातय़था विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
यदङ्कात्पतितो मातुः शिलां गात्रैरचूर्णय़त् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यदङ्गः प्रददौ वित्तं सोमसंस्थासु सप्तसु ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
यदचेष्टत कौरव्यस्तन्मे व्रूहि द्विजोत्तम ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
यदज्ञानादवोचं त्वां क्षन्तुमर्हसि तन्मम ||
२२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
यदतप्तं प्रणमति न तत्सन्तापय़न्त्यपि |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
यदतप्तं प्रणमति न तत्सन्तापय़न्त्युत |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
यदत्र गुणसम्पन्नमितरं वा हुताशन |
६१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
यदत्र तथ्यं तद्व्रूहि सत्यसन्ध द्विजातिषु |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
युधिष्ठिर उवाच
यदत्र तथ्यं तन्मे त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि |
७७ क
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
यदत्र तथ्यं पथ्यं च गत्वा वेत्स्यामि निश्चय़म् |
७ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
यदत्र तथ्यं पथ्यं च तद्व्रवीह्यविचारय़न् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
यदत्र युक्तं प्राप्तं च तद्विधत्स्व विशां पते ||
५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अकृतव्रण उवाच
यदत्रानन्तरं कार्यं तदद्यैव विचिन्त्यताम् ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
यदत्रानन्तरं कार्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
यदत्रानन्तरं कार्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
यदत्रानन्तरं कार्यं प्राप्तकालं प्रपश्यसि |
२४ क