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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
श्रद्धापूतानि भुञ्जीत निमित्तानि विवर्जय़ेत् ||
२५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
श्रद्धापूतो नरस्तात दुर्दान्तोऽपि न संशय़ः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
युधिष्ठिर उवाच
श्रद्धामारभ्य यष्टव्यमित्येषा वैदिकी श्रुतिः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
श्रद्धामास्थाय़ परमां पावनं ह्येतदुत्तमम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
श्रद्धामय़ोऽय़ं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्धामय़ोऽय़ं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
श्रद्धालक्षणमित्येवं धर्मं धीराः प्रचक्षते ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
श्रद्धावन्तो दय़ावन्तश्चोक्षाश्चोक्षजनप्रिय़ाः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्धावन्तोऽनसूय़न्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संय़तेन्द्रिय़ः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
श्रद्धावाञ्श्रद्दधानश्च धर्मांश्चैवेह वाणिजः |
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्धावाननसूय़श्च शृणुय़ादपि यो नरः |
७१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
श्रद्धावृद्धं वाङ्मनसी न यज्ञस्त्रातुमर्हति |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वासुदेव उवाच
श्रद्धेय़ः कथितो ह्यर्थः सज्जनश्रवणं गतः |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रद्धेय़वाक्यः प्राज्ञस्त्वं दिव्यं रूपं विभर्षि च |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
श्रद्धेय़वाक्यात्पुरुषादेतत्सत्यं व्रवीमि ते ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्धय़ा परय़ा तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
श्रद्धय़ा परय़ा पूतो यः प्रय़च्छेद्द्विजातय़े |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
श्रद्धय़ा परय़ा यस्त्वं तपश्चरसि सुव्रत |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
श्रद्धय़ा परय़ा युक्ता ह्यनभिद्रोहलव्धय़ा |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
श्रद्धय़ा परय़ा राजन्नुपनीतानि सत्कृतिम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३४
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्धय़ा परय़ोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रपय़ामासुरव्यग्राः शास्त्रवद्भरतर्षभ ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
श्रमं जग्मुश्च परममाजग्मुः क्षय़मेव च ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
श्रमः खेदश्च सततं हय़ानां रथिना सह ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
श्रमव्याय़ामकुशलाः समपद्यन्त यौवनम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
श्रमश्च ते युध्यमानस्य न स्या; दाकाशे वा अप्सु चैव क्रमः स्यात् ||
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
श्रमस्योपरमो दृष्टः प्रव्रज्या नाम पण्डितैः ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
श्रमादाहारमादद्यादस्वाद्वपि हि यापनम् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
श्रमाभिभूताः संरव्धाः श्रान्तवाहाः पिपासिताः |
७२ क
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
श्रमार्तस्तदुपागम्य सरो दृष्ट्वाथ विस्मितः ||
४३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १७
अगस्त्य उवाच
श्रमार्तास्तु वहन्तस्तं नहुषं पापकारिणम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
श्रमेण ग्राहय़िष्यंश्च कर्णं युद्धेन मारिष ||
५० ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
श्रमेण च विवर्णानां रूपाणां विगतं वपुः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
श्रमेण महता केचित्कुर्वन्ति प्राणधारणम् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
श्रमेण महता युक्ता मनोमारुतरंहसः ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
च्यवन उवाच
श्रमेण महता युक्ताः कैवर्ता मत्स्यजीविनः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
श्रमेण महता युक्तास्तस्मिंस्तोय़े सुसंवृते ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
श्रमेण महता युक्तास्ते विसानि कलापशः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
श्रमेण युक्तो महताद्य फल्गुन; स्तमेष कर्णः प्रसभं हनिष्यति ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविधैः शरैः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
श्रमेणोपार्जितं त्यक्तुं दुःखं शुद्धेन चेतसा |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
श्रमो नाशमुपागच्छत्सर्वं चासीत्प्रदक्षिणम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
श्रमो मम यथा न स्यात्तथा मे छन्दचारिणौ |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
श्रमो मा वाधते कृष्ण यथा वा तव रोचते ||
८४ ग
सभा पर्व
अध्याय १५
युधिष्ठिर उवाच
श्रमो हि वः पराजय़्यात्किमु तत्र विचेष्टितम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
श्रवणं च महाप्राज्ञ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
भीष्म उवाच
श्रवणं चैव विद्यानां कूटस्थं श्रेय़ उच्यते ||
२ ख