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सभा पर्व
अध्याय ५३
शकुनिरु उवाच
अक्षग्लहः सोऽभिभवेत्परं न; स्तेनैव कालो भवतीदमात्थ |
५ क
वन पर्व
अध्याय ७८
वृहदश्व उवाच
अक्षज्ञ इति तत्तेऽहं नाशय़िष्यामि पार्थिव ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अक्षज्ञः शकुनिर्जेता तदा धर्मः क्व ते गतः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षतः क्षपय़ित्वारीन्सङ्ख्येऽसङ्ख्येय़विक्रमः |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षतः शस्त्रसम्पन्नो जितारिः सह राजभिः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
अक्षतः सह पाञ्चाल्या गच्छेय़ं गन्धमादनम् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
अक्षता युगपत्केचित्प्राद्रवन्भय़पीडिताः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अक्षताः समदृश्यन्त भीमाद्भीता गतासवः ||
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
अक्षतान्कुरुपाञ्चालान्पश्येम इति कामय़े |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
अक्षताभ्यामरिष्टाभ्यां कथं युध्य महारथम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षतेन शरीरेण तस्थौ गिरिरिवाचलः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
अक्षतैः सुमनोभिश्च वाचय़ित्वा महाभुजः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
अक्षतौ संय़ुगे तत्र प्रविष्टौ कृष्णपाण्डवौ |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षत्रिय़ो वा दाशार्ह स्वधर्ममनुतिष्ठता ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षद्यूतं महाप्राज्ञ सतामरतिनाशनम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षद्यूतं मृगवधः कच्चिदेषां सुखावहम् ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
अक्षद्यूतकृतं राजन्सुघोरं वैशसं तदा ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अक्षद्यूते च नृपतिर्जितोऽस्माभिर्महाधनः |
७ ख
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
अक्षद्यूते नलं जेता भवान्हि सहितो मय़ा |
५ क
सभा पर्व
अध्याय ६७
युधिष्ठिर उवाच
अक्षद्यूते समाह्वानं निय़ोगात्स्थविरस्य च |
४ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षद्यूतेन भगवन्धनं राज्यं च मे हृतम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
अक्षप्रिय़ः सत्यवादी महानक्षौहिणीपतिः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
अक्षमा ह्रीपरित्यागः श्रीनाशो धर्मसङ्क्षय़ः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
अक्षमालापरिक्षिप्तं ज्योतिषां परमं निधिम् |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
अक्षमाय़ाः क्षमाय़ाश्च प्रिय़ाणीहाप्रिय़ाणि च |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
अक्षरं गन्तुमनसो विधिं वक्ष्यामि शीघ्रगम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽय़मात्मनः |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
यतिरु उवाच
अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽय़मात्मनः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
अक्षरं च क्षरं चैव यदुक्तं तन्निवोध मे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
अक्षरं च क्षरं चैव सच्चासच्चैव नारद ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
अक्षरं तत्तु यो वेद स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
यतिरु उवाच
अक्षरं तत्र सद्भावः स्वभावः क्षर उच्यते ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
अक्षरं ध्रुवमव्यक्तं पूर्वं व्रह्म सनातनम् ||
९६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
अक्षरं परमं व्रह्म वलवाञ्शक्र एव च |
७७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
अक्षरं व्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
अक्षरः क्षरमात्मानमवुद्धिस्त्वभिमन्यते ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
करालजनक उवाच
अक्षरक्षरय़ोरुक्तं त्वय़ा यदपि कारणम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
अक्षरक्षरय़ोरेतदुक्तं तव निदर्शनम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
अक्षरक्षरय़ोरेष द्वय़ोः सम्वन्ध इष्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
युधिष्ठिर उवाच
अक्षरक्षरय़ोर्व्यक्तिमिच्छाम्यरिनिषूदन |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
अक्षरत्वं निय़च्छेत त्यक्त्वा क्षरमनामय़म् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
अक्षरात्खं ततो वाय़ुर्वाय़ोर्ज्योतिस्ततो जलम् |
१ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षवत्यां यथाकामं सूत्रवद्धानिव द्विजान् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
अक्षश्च रथय़ोगी च सर्वय़ोगी महावलः |
११९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षसन्तर्जनो राजन्कुनदीकस्तमोभ्रकृत् ||
५३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
शकुनिरु उवाच
अक्षाणां हृदय़ं मे ज्यां रथं विद्धि ममास्तरम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अक्षाणामथ योक्त्राणां चक्राणां रश्मिभिः सह |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
अक्षाणामथ योक्त्राणां प्रतोदानां च सर्वशः ||
१४ ख