वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
अथासौ मृदुय़ुद्धेन न मुञ्चेद्भीम कौरवान् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्त्रं जाज्वलद्घोरं पाण्डवस्यामितौजसः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अथास्त्रमरिसङ्घघ्नं त्वाष्ट्रमभ्यस्यदर्जुनः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
अथास्त्रसङ्घर्षकृतैर्विस्फुलिङ्गैः समावभौ |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
अथास्माच्छ्रीरपाक्रामद्यास्मिन्नासीत्प्रतापिनी ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
शार्ङ्गका ऊचुः
अथास्मान्न दहेदग्निराय़ास्त्वं पुनरेव नः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
अथास्मै त्वरितो वाणमपरं जीवितान्तकम् |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अथास्मै सुवहून्वाणान्माद्रीपुत्रः समाचिनोत् ||
४२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य कवचं वाणैर्निशितैर्मर्मभेदिभिः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
अथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अथास्य चर्माप्रतिमं न्यकृन्त; द्भीमो महात्मा दशभिः पृषत्कः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
अथास्य जृम्भतः शक्रस्ततो वज्रमवासृजत् ||
६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अथास्य तं रथं तूर्णं तिलशो व्यधमच्छरैः |
८६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
अथास्य तदपि क्रुद्धश्चिच्छेद धनुरर्जुनः ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अथास्य तदपि क्रुद्धश्चिच्छेद धनुरर्जुनः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
अथास्य तनय़ो जज्ञे प्रतर्दन इति श्रुतः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
अथास्य तैलेनाङ्गानि सर्वाण्येवाभ्यमृक्षय़त् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य दर्शय़ामास तदात्मानं प्रिय़ः सखा ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
५६
वृहदश्व उवाच
अथास्य द्वादशे वर्षे ददर्श कलिरन्तरम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अथास्य धनुषः कोटिं पुनश्चिच्छेद मारिष ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
अथास्य निजघानाश्वांश्चतुरो नतपर्वभिः |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
अथास्य नेष्टं मरणं स्थातुमिच्छेदिमां क्रिय़ाम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य पश्चाद्विदुर आचख्यौ पाण्डवान्वृतान् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य पादौ जग्राह भीष्मश्चाभिननन्द तम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
अथास्य प्रविवेशास्यं व्राह्मणो विगतज्वरः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
अथास्य प्रहरेत्काले किञ्चिद्विचलिते पदे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
अथास्य प्रहरेत्काले किञ्चिद्विचलिते पदे ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
अथास्य भक्ष्यमाजह्रुः समुद्रजलचारिणः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
अथास्य भल्लेन शिरः सारथेः समकृन्तत |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
अथास्य मुनिरागच्छत्सङ्गत्या वै तमाश्रमम् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य युगमेकेन चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
अथास्य योगय़ुक्तस्य सिद्धिमात्मनि पश्यतः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
अथास्य लोकः पूर्वो यः सोऽमृतत्वाय़ कल्पते ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
अथास्य वहुभिर्वाणैरच्छिनत्परमास्त्रवित् |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
अथास्य वहुशो वाणा निश्चरन्तः सहस्रशः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य वाणेन विदारितस्य; प्रादुर्वभूवासृगजस्रमुष्णम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अथास्य वाहांस्त्वरितः शरैर्निन्ये यमक्षय़म् ||
४४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
अथास्य वाहू द्विपहस्तसंनिभौ; शिरश्च पूर्णेन्दुनिभाननं त्रिभिः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य वाहूरुशिरोललाटं; ग्रीवां रथाङ्गानि परावमर्दी |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
अथास्य वुद्धिरभवत्तपस्ये भरतर्षभ |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य वुद्धिरभवत्पुनरन्या तदा किल ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
अथास्य शितपीतेन भल्लेनादिश्य कार्मुकम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अथास्य शैलशिखरं केशी क्रुद्धो व्यवासृजत् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अथास्य समभिद्रुत्य समुत्क्रम्य च सिंहवत् ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अथास्य समरे क्रुद्धो ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अथास्य समय़ं कृत्वा विनाशाय़ स्थिताः परे ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
अथास्य सशरं चापं पुनश्चिच्छेद मारिष |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
अथास्य सशरं चापं मुष्टौ चिच्छेद मारिष |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अथास्य सशरं चापं हस्तावापं च मारिष |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
अथास्य सशिरस्त्राणं शिरः काय़ादपाहरत् ||
१७ ख