द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अथास्य सशिरस्त्राणं शिरः काय़ादपाहरत् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
अथास्य सारथिं क्रुद्धो रथोपस्थादपाहरत् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अथास्य सूतस्य शिरो निकृत्य; भल्लेन कालानलसंनिभेन |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
अथास्य सूतस्य शिरो निकृत्य; भल्लेन वज्राशनिसंनिभेन |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
अथास्याददतः खड्गं शतचन्द्रं च भानुमत् |
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
अथास्याश्वान्पुनर्हत्वा त्रिभिर्विव्याध सारथिम् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अथास्यासीदिय़ं चिन्ता तत्प्राप्य सुमहद्भय़म् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अथास्येषुं समाधत्त दृढं परमसंशितम् |
१५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
अथाह गालवं दीनं सुपर्णः पततां वरः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अथाहं हास्तिनपुरमाय़ां जित्वा महीक्षितः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
अथाहमवरोक्ष्यामि पश्चाद्भरतसत्तम ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
अथाहमव्रुवं तत्र देवीं तां तपसान्विताम् |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
अथाहरिष्ये वासांसि दिव्यानि रुचिराणि च ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
अथाह्वय़न्त तेऽन्योन्यमय़ं प्राप्तो वृकोदरः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
अथाय़मभजल्लोकः स्कन्दं शुक्लस्य पञ्चमीम् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
अथाय़युर्देवगणा विमानै; रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
अथेङ्गितं वज्रधरस्य नारदः; श्रिय़ाश्च देव्या मनसा विचारय़न् |
८८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
अथेतरांस्ततः शूरान्द्वाभ्यां द्वाभ्यामताडय़त् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
अथेतरान्महाराज यतमानान्महारथान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
अथेतरान्महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरविध्यत |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अथेतरान्महेष्वासान्दशभिर्दशभिः शरैः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
अथेतरे महेष्वासाः पञ्च पञ्च शिलीमुखान् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
अथेतरे महेष्वासाः सहसैन्या नराधिपाः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अथेतरे संनिवृत्ताः पुनर्द्रोणमुखा रथाः |
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
अथेध्मान्समुपादाय़ स पावकिरुपागमत् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
अथेन्द्रस्तं विवर्धमानं सोमपानाप्याय़ितसर्वगात्रं दृष्ट्वा चिन्तामापेदे ||
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
अथेन्द्रस्य भविष्यत्वादहङ्कारस्तमाविशत् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
अथेन्द्रस्य महाघोरं सोऽसृजच्छत्रुमेव ह |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
अथेमं दर्शनोपाय़ं सम्यग्यो वेत्ति मानवः |
७६ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
अथेमां दुष्कृतां पूजां शिशुपालो व्यवस्यति |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
अथेमां सागरापाङ्गां गां गजेन्द्रगताखिलाम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
अथेश्वरमुवाचेदमात्मनः सा वचो हितम् |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
अथेह पुरुषव्याघ्र किञ्चिदन्यच्चिकीर्षसि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
अथैकान्तव्युदासेन शरीरे पञ्चभौतिके |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
अथैतत्कच्छपेनोदाहृतं श्रुत्वा समनन्तरं देवलोकाद्देवरथः प्रादुरासीत् ||
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
अथैतदेवं न करोषि राज; न्ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
अथैतद्वचनं मेऽद्य निय़ुक्ता न करिष्यसि |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
अथैतस्यामवस्थाय़ां पौरुषं हातुमिच्छसि |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
अथैतावव्रवीच्छक्रः साह्यं नः क्रिय़तामिति ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
अथैतेन प्रकारेण पुण्यमाहुर्न ताञ्जनाः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
अथैत्य पुरुषः कश्चित्क्षीणपुण्यनिपातकः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
अथैत्य राजा युधि सत्यसन्धो; जय़द्रथोऽत्युग्रवलो मनस्वी |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
अथैनं कोष्ठकीकृत्य सर्वतस्ते महारथाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
अथैनं कौरवश्रेष्ठाः सर्व एव महारथाः |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
अथैनं छिन्नधन्वानं ताडय़ामास साय़कैः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महारथः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महारथः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महीपतिः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
अथैनं छिन्नधन्वानं नवभिर्निशितैः शरैः |
८ क