शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रो यतो राजा ततः सर्व उपाविशन् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
धृतराष्ट्रो यथा वाच्यो द्रोणश्च विदुषां वरः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
धृतराष्ट्रो हि योधेषु सर्वेष्वेव सदार्जुन |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
अर्जुन उवाच
धृतराष्ट्रो हि राजर्षिः सर्वथा मानमर्हति ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातय़ो भरतर्षभ ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातय़ो भरतर्षभ ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रोऽथ राजासीत्तस्य पुत्रोऽथ कुण्डिकः |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रोऽपि तच्छ्रुत्वा ध्यानमेवान्वपद्यत ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रोऽपि धर्मात्मा स्वस्थचेता महामनाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रोऽपि राजेन्द्र संवृतः सर्वकौरवैः |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रोऽभवन्मूढः शोकं च परमं गतः |
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रोऽव्रवीत्प्रेष्यान्दुर्योधनमते स्थितः ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रोऽव्रवीद्भीष्ममर्चय़ित्वा महाभुजम् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
धृतवर्मा शरं तीक्ष्णं मुमोच विजय़े तदा ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
धृता हि वेणी पार्थेन विराटनगरे तदा ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
धृताः पाण्डुसुता राजञ्जय़श्चैषां भविष्यति ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
धृतिं कुर्वीत सारथ्ये धृत्या तानि जय़ेद्ध्रुवम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
धृतिं गृह्णीत मा शत्रूञ्शोचन्तौ नन्दय़िष्यथः ||
३५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
धृतिं समालम्व्य विवृत्तलोचनो; वलेन संस्तभ्य वृकोदरः स्थितः ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
धृतिः शमो दमः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
धृतिपराः सत्त्वय़ोगाच्छरीराण्युद्वहन्ति ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
धृतिमत्पञ्चमं वर्षं षष्ठं वर्षं प्रभाकरम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
धृतिमन्तमनाधृष्यं जेतारमपराजितम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
धृतिमन्तश्च दक्षाश्च स्वे स्वे कर्मणि भारत |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
धृतिमन्तो महाप्राज्ञाः सर्वभूतहिते रताः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
धृतिमन्तो ह्रीनिषेधा धर्मात्मानो यशस्विनः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
धृतिमांश्च कृतज्ञश्च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||
३४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
धृतिमानप्रमत्तश्च दान्तो धर्मविदात्मवान् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
धृतिमानहिंसानिरतः सत्यवागनसूय़कः |
९१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
धृतिमानात्मवान्वुद्धिं निगृह्णीय़ादसंशय़म् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
धृतिमान्क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
धृतिमान्देशकालज्ञः सर्वधर्मविधानवित् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
धृतिमान्मतिमान्दक्षः सत्कृतश्च युगाधिपः ||
१११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
धृतिमान्सर्वधर्मज्ञः सत्ये तपसि च स्थितः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
धृतिमास्थाय़ भगवन्न शोचामि ततस्त्वहम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
धृतिर्दमो व्रह्मचर्यं क्षमा धर्मश्च नित्यदा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
धृतिर्दाक्ष्यं संय़मो वुद्धिरग्र्या; धैर्यं शौर्यं देशकालोऽप्रमादः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
धृतिर्नाम सुखे दुःखे यथा नाप्नोति विक्रिय़ाम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
धृतिश्च दुःखत्यागश्चाप्युभय़ं नः सुखोदय़म् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
धृत्या च ते प्रीतमनाः सदाहं; त्वं वा राजा धर्मराजो यमो वा ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
धृत्या च पुरुषव्याघ्रो नैभृत्येन च पाण्डवः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
धृत्या च भीमसेनस्य विक्रमेणार्जुनस्य च ||
८० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
धृत्या चैव प्रज्ञय़ा चाभिभूय़; धर्मार्थय़ोगान्प्रय़तन्ति पार्थाः ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
धृत्या तुष्टो नरेन्द्रस्य गान्धारी विदुरस्तथा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
धृत्या देहान्धारय़न्तो वुद्धिसङ्क्षिप्तमानसाः |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
धृत्या द्वितीय़वान्भवति वुद्धिमान्वृद्धसेवय़ा ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
धृत्या यय़ा धारय़ते मनःप्राणेन्द्रिय़क्रिय़ाः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा |
२८ क