उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
अदृश्यन्त्यां च वासिष्ठो वसिष्ठश्चाक्षमालय़ा |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यन्राक्षसास्तत्र कृष्णचक्रविदारिताः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यमकरोत्तूर्णं जलदो भास्करं यथा ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यमर्जुनं चक्रे निमेषाच्छरवृष्टिभिः ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
अदृश्यमानस्तस्याद्य तमस्विन्यामनिन्दिते ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
अदृश्यमानस्तान्पश्यन्नपश्यंश्च पुनः पुनः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यमाना मनुजैर्व्यचरन्पुरुषर्षभ ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
अदृश्यमानास्ते दैत्या योधय़न्ति स्म माय़या |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यमाने कौरव्ये पुत्रे दुर्योधने तव |
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यमानैर्दुष्टात्मा सह भ्रातृभिरच्युत ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
अदृश्यमानौ भूतानि योधय़ेतामसंशय़म् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
अदृश्यमानौ भूतानि योधय़ेतामसंशय़म् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यमार्जुनिं चक्रुर्निमेषात्ते नृपात्मजाः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
अदृश्यरूपा वाचश्चाप्यव्रुवन्साधु साध्विति ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
विष्णुरु उवाच
अदृश्यश्च प्रवेक्ष्यामि वज्रमस्याय़ुधोत्तमम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अदृश्यस्याप्रमेय़स्य श्रूय़ते विपुलो ध्वनिः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
अदृश्या गच्छ भीरु त्वं सरस्वति मरुं प्रति |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
अदृश्या ह्यभ्यवर्तन्त विसृजन्तः शिलोच्चय़ान् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यानकरोद्योधांस्तावकाञ्शत्रुतापनः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
अदृश्यानस्त्रवीर्येण तानप्यहमय़ोधय़म् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
अदृश्यानि महाराज स्थानान्ययुतशो दिवि |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
अदृश्यामपि कौन्तेय़े स्थितां पश्यन्निवोद्यताम् |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
अदृश्याय़ त्वगम्याय़ कः प्रमाणमुदाहरेत् ||
३१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
अदृश्येतां महात्मानौ कालसूर्याविवोदितौ ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
अदृश्येतां महात्मानौ शत्रुसम्वाधकारिणौ ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
अदृश्येतां महाराज तदद्भुतमिवाभवत् ||
१० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
अदृश्येतां महावाहू यथा मृत्युजरातिगौ ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
अदृश्येतां मुदा युक्तौ समुत्तीर्यार्णवं यथा ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
अदृश्येतां रणे क्रुद्धावुल्काभिरिव कुञ्जरौ ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
अदृश्येन हृतो भागो देवेन हरिमेधसा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
अदृश्येष्वन्यथा कृष्ण दृश्येषु पुनरन्यथा ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
अदृश्यौ च शरौघैस्तौ निघ्नतामितरेतरम् ||
६९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
अदृष्टं वत पश्यामि द्विषतां वशमागतम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
अदृष्टतोऽनुपाय़ाच्च अप्यभिसन्धेश्च कर्मणः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अदृष्टपूर्वं तद्दृष्ट्वा सिंहनादो महानभूत् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
अदृष्टपूर्वं पश्यन्तस्तद्युद्धं गुरुशिष्ययोः ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अदृष्टपूर्वं पश्यन्त्यो दुःखार्ता भरतस्त्रिय़ः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
अदृष्टपूर्वं पश्यामि शिलानामिव सर्पणम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
अदृष्टपूर्वं राजानः पश्यन्तु कुरुभिः सह ||
४० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अदृष्टपूर्वं सङ्ग्रामे तद्दृष्ट्वा महदद्भुतम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
अदृष्टपूर्वं सन्त्रासान्न्यमीलय़त लोचने ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
अदृष्टपूर्वं सहसा तत्त्वदर्शनवर्जितः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा; भय़ेन च प्रव्यथितं मनो मे |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
अदृष्टपूर्वः पुरुषो रविर्यथा; वितर्कय़न्नास्य लभामि सम्पदम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
अदृष्टपूर्वमपि तत्सत्त्वं तेन हतं तदा |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
अदृष्टपूर्वश्चक्षुर्भ्यां न चासौ नास्ति तावता ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
अदृष्टपूर्वा या नार्यः पुरा देवगणैरपि |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अदृष्टपूर्वा या नार्यो भास्करेणापि वेश्मसु |
७१ क
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
अदृष्टपूर्वां दुःखस्य दुःखार्तां ध्यानतत्पराम् ||
२५ ख