विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षानाहर सैरन्ध्रि कङ्क द्यूतं प्रवर्तताम् ||
२९ ग
सभा पर्व
अध्याय
५३
शकुनिरु उवाच
अक्षानुप्त्वा देवनस्य समय़ोऽस्तु युधिष्ठिर ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
अक्षानुप्त्वा पुनर्द्यूतमिदं दीव्यन्तु पाण्डवाः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
अक्षानुप्त्वा पुनर्द्यूतमेहि दीव्यस्व भारत ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
शकुनिरु उवाच
अक्षान्क्षिपन्नक्षतः सन्विद्वानविदुषो जय़े ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
अक्षान्न तेऽक्षा निशिता वाणास्ते शत्रुतापनाः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
अक्षान्प्रवप्तुं कुशलोऽस्मि देविता; कङ्केति नाम्नास्मि विराट विश्रुतः ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षान्यान्मन्यसे मूढ गान्धाराणां यशोहर |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
अक्षान्संमन्यमानः स प्रा क्षरास्ते दुरासदाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
अक्षान्हि दृष्ट्वा शकुनेर्यथाव; त्कामानुलोमानय़ुजो युजश्च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
अक्षीणश्च शकुन्तश्च वभ्रुः कालपथस्तथा ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षीय़त ततो राष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
अक्षीय़माणो न्यस्तास्त्रस्त्वद्वाक्येनाहवे हतः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
अक्षुद्रः क्षुद्रकैर्द्रोणात्क्रुद्धरूपमवारय़त् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
अक्षुद्रः सत्पथालम्वी स राज्यफलभाग्भवेत् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
अक्षुद्रमनसूय़ं च वृद्धं मौनव्रते स्थितम् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
अक्षुद्रसचिवश्चाय़ं कुन्तीपुत्रो महामनाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
अक्षुद्राः शुचय़ो दक्षा नराः स्युः पारिपार्श्वकाः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षुद्रान्दानशीलांश्च सत्यशीलाननास्तिकान् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षुद्रान्दृढभक्तांश्च दैवतेज्यापरान्सदा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
अक्षुभ्यत वलं हर्षादुद्धूत इव सागरः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षुव्धत्वेऽर्णवसमः सहिष्णुत्वे धरासमः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
अक्षेत्रः क्षेत्रमात्मानमसर्गः सर्गमात्मनः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अक्षेपसर्गय़ोःकर्ता निश्चलः पुरुषः स्मृतः ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अक्षेषाय़ुगय़ोक्त्राणि चक्राणि विविधानि च |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
अक्षेषु दोषा वहवो विधर्माः; श्रुतास्त्वय़ा सहदेवोऽव्रवीद्यान् |
८६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
अक्षेषु मृगय़ाय़ां च पाने स्त्रीषु च वीर्यवान् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
अक्षेषु मृगय़ाय़ां च पूर्वसृष्टं पुनः पुनः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
अक्षैर्विमथितैश्चक्रैर्भग्नैश्च वहुधा युगैः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अक्षैर्विमथितैश्चक्रैर्भग्नैश्च वहुधा रथैः |
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
अक्षैश्च वहुधा भग्नैरीषादण्डकवन्धुरैः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अक्षो भग्नो ध्वजश्छिन्नश्छत्रमुर्व्यां निपातितम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
अक्षोभ्यं क्षोभय़ंस्तार्क्ष्यमुवाच रथचक्रभृत् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
अक्षोभ्यत तदा राजन्पाण्डूनां ध्वजिनी पुनः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
अक्षोभ्योऽय़मभेद्यश्च भीष्मेणामित्रकर्शिना |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिणी हि सेना सा तदा यौधिष्ठिरं वलम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिणीं राक्षसानां शितैर्वाणैरशातय़त् ||
११४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अक्षौहिणीं वा सैन्यस्य कस्य वा किं ददाम्यहम् ||
१३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अक्षौहिणीः सप्त युधिष्ठिरस्य; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
दुर्योधन उवाच
अक्षौहिणीः सप्त लव्ध्वा राजभिः सह सञ्जय़ |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जय़द्रथः |
१६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जय़द्रथः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिणीति पर्याय़ैर्निरुक्ताथ वरूथिनी |
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
अक्षौहिणीनां तिसृणामासीत्समरदर्पितः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिणीनां पतय़ो यज्वानो भूरिदक्षिणाः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिणीनां सर्वासां समेतानां जनेश्वर |
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिणीपतींश्चान्यान्नरेन्द्रान्दृढविक्रमान् ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिणीपतीनुग्रान्संरव्धान्युद्धदुर्मदान् ||
१४ ख