chevron_left  अदृष्टपूर्वानादाय़arrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
अदृष्टपूर्वानादाय़ भावानपरिशङ्कितान् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
अदृष्टरूपस्तौ चापि सर्वतः पर्यकालय़त् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
अदृष्टशास्त्रकुशलैर्न लोभाद्वध्यते शुचिः ||
९३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
वृहस्पतिरु उवाच
अदृष्टितो विकुरुते दृष्ट्वा वा नाभिभाषते ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
अदृष्टेन ततोऽस्म्युक्तो ध्वंस सर्पेति वै रुषा ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भृगुरु उवाच
अदृष्टेनाथ भृगुणा भूतले भरतर्षभ ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
अदृष्ट्वा तु नृपः पुत्रान्दर्शनं प्रतिलव्धवान् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
अदृष्ट्वा तु रथानीके दुर्योधनमरिन्दमम् |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
अदृष्ट्वा स महीपालस्तमृषिं सह भार्यया |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
अदृष्ट्वैव तु पूतात्मा विषय़ेभ्यो निवर्तते ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
अदेशकालज्ञमनिष्टवेष; मेतान्गृहे न प्रतिवासय़ीत ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीय़ते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
अदेशस्थं हि ते स्थानमिति व्याधोऽव्रवीद्द्विजम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अदेशिका महारण्ये ग्रीष्मे शत्रुवशं गता |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
अदेहमजरं दिव्यमतीन्द्रिय़मनीश्वरम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अदेय़ं पितृदेवेभ्यो यच्च क्लैव्यादुपार्जितम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
अदेय़मपि दास्यामि व्रूहि यत्ते विवक्षितम् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
वसिष्ठ उवाच
अदेय़ा नन्दिनीय़ं मे राज्येनापि तवानघ ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थितिः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अद्धा किं तत्कारणं यस्य हेतोः; प्रज्ञाविरुद्धं कर्म चिकीर्षसीदम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अद्भिः प्राणान्समालभ्य नाभिं पाणितलेन च |
९५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
अद्भिः सिक्त्वास्तम्भय़त्तं सवज्रं सहपर्वतम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
अद्भिरेव प्रदातव्या कन्या गुणवते वरे |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
अद्भिर्गात्रान्मलमिव तमोऽग्निप्रभय़ा यथा |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अद्भुतं च महाराज तत्र चक्रे वृकोदरः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
अद्भुतं चाद्य पश्यन्तु लोके सर्वधनुर्धराः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च दृष्ट्वा कर्म तय़ोर्मृधे ||
३२ ग
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च सर्वत्र समतां गतम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
अद्भुतं महदाश्चर्यं श्रूय़ते कुरुनन्दन |
३ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अद्भुतस्य प्रिय़ा भार्या तस्याः पुत्रो विडूरथः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
अद्भुतस्याद्भुतं पुत्रं प्रवक्ष्याम्यमितौजसम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
अद्भुतानि च घोराणि दारुणानि च भारत |
१० क
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
अद्भुतानि च तत्रासन्यानि तानि निवोध मे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
अद्भुतानि रसस्पर्शे शीतोष्णे मारुताकृतिः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
अद्भुतानि विचित्राणि चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
अद्भ्यः स्तोका यान्ति यथा पृथक्त्वं; ताभिश्चैक्यं सङ्क्षय़े यान्ति भूय़ः |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
अद्भ्यो गन्धगुणा भूमिः पूर्वैषा सृष्टिरुच्यते ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
अद्भ्यो महत्तरं तेजस्तेजसः पवनो महान् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
अद्भ्योऽग्निर्व्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
अद्भ्योऽग्निर्व्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
अग्निरु उवाच
अद्भ्योऽग्निर्व्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
अद्भ्योऽग्निर्व्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अद्य कर्णं महावेगाः प्रेषय़न्तु यमक्षय़म् ||
८५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
अद्य कर्णं रणे कृष्ण सूदय़िष्ये न संशय़ः |
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य कर्णं हतं दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य कर्णे हते कृष्ण धार्तराष्ट्राः सराजकाः |
२० क