आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
स भीमो भीमसंस्पर्शः शत्रुसेनाङ्गपातनः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
स भीष्मं पञ्चविंशत्या कृपं च नवभिः शरैः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
स भीष्मं पूजय़ामास वार्ष्णेय़ो वाग्भिरञ्जसा ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
स भीष्मः सुसमर्थोऽय़मस्माभिः सहितो रणे |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
स भीष्ममामन्त्र्य कुरुप्रवीरं; वैचित्रवीर्यं च महानुभावम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
स भुक्तवान्सुविश्रान्तो गौतमोऽचिन्तय़त्तदा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स भुजङ्गैरिवाय़स्तैर्गाण्डीवप्रेषितैः शरैः |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स भूतानां भावनो भूतभव्यः; स विश्वस्यास्य जगतश्चापि गोप्ता ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
स भूतान्यसृजत्सप्त दक्षादींस्तु प्रजापतीन् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
स भूत्वा भगवान्सङ्ख्ये रक्षंश्छागमुखस्तदा |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
स भूत्वा मृत्युरन्येषां स्वय़ं मृत्युवशं गतः ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२१
गान्धार्यु उवाच
स भूत्वा शरणं वीरो धार्तराष्ट्रस्य माधव |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
कृप उवाच
स भूमौ निहतः शेते कुरुराजः परैरय़म् ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
स भूमौ निहतः शेते शान्तार्चिरिव पावकः ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स भूय़ः शुशुभे पार्थस्ताडितो गदय़ा रणे |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
स भूय़श्चिन्तय़ामास न न्याय़्यं क्षुभितोऽस्मि यत् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
स भृत्यगुणसम्पन्नं राजा फलमुपाश्नुते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
स भृशं तप्यतेऽनेन वाक्षल्येन परिक्षतः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
स भृशं ताडय़न्वीरो रावणिर्माय़यावृतः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
स भोगान्विविधान्भुञ्जन्रत्नानि विविधानि च |
९१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
स भोजराजः सैन्येन महता परिवारितः |
१७ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
स भोजैः सह संय़ुक्तः सात्यकिश्चान्धकैः सह |
३३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स भ्रष्टो मधुलोभेन शोचत्येव यथा भवान् ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स भ्रातृभिः पुनर्धीमानृत्विग्भिश्च महात्मभिः |
१८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स भ्रातॄन्पतितान्दृष्ट्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
स भय़ाद्द्वैरथं दृष्ट्वा त्रैगर्तं प्राजहत्तदा ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
स मच्छरीरे त्वच्छापाद्दह्यमानोऽवसत्कलिः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
स मञ्जूषागतो गर्भस्तरङ्गैरुह्यमानकः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
स मत्त इव मातङ्गः सङ्क्रुद्ध इव चोरगः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
स मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपय़ाभिपरिप्लुतः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स मत्स्यो नाम राजासीद्धार्मिकः सत्यसङ्गरः ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
स मद्रराजः सहसावकीर्णो; भीमाग्रगैः पाण्डवय़ोधमुख्यैः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
स मध्यं प्राप्य पाण्डूनां शररश्मिः प्रतापवान् |
१०६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
स मध्यं प्राप्य सेनाय़ाः सर्वाः परिचरन्दिशः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
स मध्यं प्राप्य सैन्यानां सर्वाः प्रविचरन्दिशः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
स मनः सर्वभूतानां प्रद्युम्नः परिपठ्यते ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
स मन्त्रकाले संमन्त्र्य सर्वा नैःश्रेय़सीः क्रिय़ाः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स मन्त्रान्समभिध्याय़ हृष्यमाणोऽभ्यभाषत ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स मन्त्रिणः समानाय़्य भ्रातॄंश्च वदतां वरः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
स मन्यमानस्त्वाचार्यो ममाय़ं फल्गुनो यथा |
७९ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
स मन्युर्व्यगमच्छीघ्रं मुमोच च पुरन्दरम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
स मन्युवशमापन्नः कार्तवीर्यमुपाद्रवत् |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
स मन्युवशमापन्नः पार्थमभ्यद्रवद्रणे |
६७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
स मन्युवशमापन्नः स्वभावं दुष्टमास्थितः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
स मन्ये तेन रूपेण विस्मापय़ति हि स्वय़म् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
स मर्दमानः स्ववलं वाय़ुर्वृक्षानिवौजसा ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
स मलेनापकृष्टेन पिप्लुस्तस्या व्यरोचत |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
स मल्ल इति विख्यातः पृथिव्यामभवन्नृपः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
स महर्षिवाक्यसमकालमेव तस्माद्यानादवापतत् ||
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
स महर्षिय़ुक्तं वाहनमधिरूढः शचीसमीपमुपागच्छत् ||
३७ क