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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अद्य पाञ्चालसेनां तां निहत्य निशि सौप्तिके |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
अद्य पाण्डवमुख्यस्य श्वेताश्वस्य महात्मनः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य पाण्डुर्महाराजो वनादिव वनप्रिय़ः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य पाण्डुर्मृतो राजा भ्राता मम सुदुर्लभः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
शल्य उवाच
अद्य पाण्डुसुताः सर्वे वासुदेवः ससात्यकिः ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य पाण्डुसुतान्सर्वाञ्जीविताद्भ्रंशय़िष्यति ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
अद्य पाण्डुसुतान्सर्वान्ससैन्यान्सह वन्धुभिः |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
अद्य पाण्डुसुतो राज्यं लभतां वा युधिष्ठिरः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
भीम उवाच
अद्य पारं गमिष्यामि वैरस्य भृशदुर्गमम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
अद्य पुष्यो निशि व्रह्मन्पुण्यं योगमुपैष्यति |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य पौष्यं योगमुपैति चन्द्रमाः; पाणिं कृष्णाय़ास्त्वं गृहाणाद्य पूर्वम् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य प्रभृति कौन्तेय़ यजस्व समय़ो हि ते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
अद्य प्रभृति ते राजन्नाकाशे विहता गतिः |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
स्कन्द उवाच
अद्य प्रभृति दास्यन्ति सुवृत्ताः सत्पथे स्थिताः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
अद्य प्रभृति देहं स्वं सर्वभोगैर्विवर्जितम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य प्रभृति मां राजन्कष्टा हृदय़शोषणाः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
देवव्रत उवाच
अद्य प्रभृति मे दाश व्रह्मचर्यं भविष्यति |
८८ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
अद्य प्रभृति युष्माकं धर्मवृद्धिर्भविष्यति ||
१२८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
अद्य प्रभृति श्रीवत्सः शूलाङ्कोऽय़ं भवत्वय़म् |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अद्य प्रभृति सङ्क्रुद्धा व्याघ्रा इव मृगक्षय़म् |
१३ क
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य प्रभृति सर्वेषु वृष्ण्यन्धकगृहेष्विह |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
अद्य प्रभृत्यहं राजन्कुशप्रस्तरशाय़िनी |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अद्य प्राप्तोऽसि दिष्ट्या मे चक्षुर्विषय़मित्युत ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अद्य भीष्मो रणे क्रुद्धो निहनिष्यति सोमकान् ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
अद्य मद्वाणजालानि विमुक्तानि सहस्रशः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अद्य मद्वाणनिर्दग्धं पतितं धरणीतले |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
अद्य मद्वाणनिर्दग्धाः पाञ्चालाः सोमकास्तथा |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
अद्य मद्वाणनिहतान्योधमुख्यान्सहस्रशः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
अद्य माधव राजानमप्रमत्तोऽनुपालय़ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
अद्य मे क्रुद्धरूपस्य निघ्नतश्च वरान्वरान् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
अद्य मे क्षिप्रहस्तस्य क्षिपतः साय़कोत्तमान् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
नारद उवाच
अद्य मे तपसो देव यमस्य निय़मस्य च |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
अद्य मे भ्रातरः क्षीणाश्चित्रसेनादय़ो युधि |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
अद्य मे युध्यमानस्य सह गाण्डीवधन्वना |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
शल्य उवाच
अद्य मे विक्रमं दृष्ट्वा पाण्डवानां महारथाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अद्य मे विक्रमं पार्थो विज्ञास्यति धनञ्जय़ः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
अद्य मे सफलं जन्म तारितं चाद्य मे कुलम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अद्य मोदन्तु पाञ्चाला निहतेष्वरिषु त्वय़ा |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
अद्य युद्धं कुरुश्रेष्ठ मम पार्थस्य चोभय़ोः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
अद्य युद्धं महाघोरं तव दास्यामि सात्वत |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अद्य युद्धं हि ताभ्यां मे सम्पराय़े भविष्यति ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
अद्य युद्धे सुसङ्क्रुद्धो दीर्घं राज्ञः प्रजागरम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
अद्य योत्स्येऽर्जुनमहं पौरुषं स्वं व्यपाश्रितः |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अद्य राजन्समेष्यामि पाण्डवेन यशस्विना |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
अद्य राजसहस्राणि निहतानि मय़ा रणे |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
अद्य राजा धार्तराष्ट्रः कृतार्थो वै भविष्यति |
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य राजा धृतराष्ट्रः स्वां वुद्धिमवमंस्यते |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अद्य राजा सत्यधृतिर्जितामित्रो युधिष्ठिरः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अद्य राजास्मि गोविन्द पृथिव्यां भ्रातृभिः सह |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अद्य राज्यात्सुखाच्चैव श्रिय़ो राष्ट्रात्तथा पुरात् |
१० क