स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मेण हतं श्रुत्वा भीमसेनेन ते सुतम् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
अधर्मेण हतः पार्थ तस्यैषा निष्कृतिः कृता ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
अधर्मेण हतस्याजौ मृद्यमानं पदा शिरः |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
अधर्मेण हते तात पुत्रे दुर्योधने मम |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मेण हि धर्मिष्ठं हृतं वै राज्यमीदृशम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मेण हृतं राज्यं सर्वे दासाः कृतास्तथा |
६८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
अष्टक उवाच
अधर्मेणानुशास्तूर्वीं यस्ते हरति पुष्करम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
अधर्मेणापकृष्टश्च मद्रराजः परैरितः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
अधर्मेणापि संय़ुक्तं प्रिय़माभ्यां करोम्यहम् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मेणेति तत्रापि शृणु मे वाक्यमुत्तरम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
अधर्मो जाय़ते यस्मिन्निति वै कवय़ो विदुः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
धृष्टद्युम्न उवाच
अधर्मो धर्म इति वा व्यवसाय़ो न शक्यते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
अधर्मो धर्म इति ह योऽज्ञानादाचरेदिह |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
अधर्मो धर्म इत्येतद्यथा वृकपदं तथा |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
अधर्मो न स्पृशेदेवं महान्मामिह भार्गव |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संय़च्छेमाः प्रजाः शुभे |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मो यत्र धर्माख्यो धर्मश्चाधर्मसञ्ज्ञितः |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मो यदि वा धर्मस्त्रासात्तत्र मय़ा कृतः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अधर्मो वर्धति महान्न च धर्मः प्रवर्तते ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
अधर्मो वर्धते चापि सङ्कीर्यन्ते तथा प्रजाः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मो वा महानस्तु वने वा मरणं मम |
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अधर्मो हि कृतस्तीव्रः कथं स्यादफलश्चिरम् ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्मो हि कृतस्तेन येनैतदुपशिक्षितम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
अधर्मोत्तरता नाम कृत्स्नं व्यापादय़ेज्जगत् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अधर्मोपार्जितैरर्थैर्यः करोत्यौर्ध्वदेहिकम् |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
द्रुपद उवाच
अधर्मोऽय़ं मम मतो विरुद्धो लोकवेदय़ोः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्म्यमय़शस्यं च क्रिय़ते पार्थिव त्वय़ा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
अधर्म्यमय़शस्यं च मा राजन्प्रतिपद्यथाः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
अधर्म्यमय़शस्यं च शात्रवाणां प्रय़ाचनम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
अधर्म्यादय़शस्याच्च कर्मणस्त्वं प्रमोक्ष्यसे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
अधर्म्यो हि मृदू राजा क्षमावानिव कुञ्जरः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
अधर्मय़ुक्तं च न कामय़ेत; राज्यं सुराणामपि धर्मराजः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
अधर्मय़ुक्तं संय़ोगं कुरुष्वैवं कुरूद्वह ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
अधर्मय़ुक्ता दुष्प्रज्ञा वाला मैषां वचः कृथाः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
अधर्मय़ुक्तो विजय़ो ह्यध्रुवोऽस्वर्ग्य एव च |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अधर्षणीय़ः शत्रूणां तैर्वृतस्त्वं भविष्यसि ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि; कर्मानुवन्धीनि मनुष्यलोके ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
अधश्चक्रस्य चैवात्र दीप्तानलसमद्युती |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु माचिरम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा; गुणप्रवृद्धा विषय़प्रवालाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अधस्तात्पृथिवीपाल सर्वं नाशय़ते क्षणात् ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
अधस्ताद्धरणीं योऽसौ सदा धारय़ते नृप |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
अधस्तिर्यग्गतिं चैव स्वर्गे चैव परां गतिम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
अधार्मिका भिन्नवृत्ताः साध्वेवैषां पराभवः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अधार्मिकाणां धर्मिष्ठा विरूपाणां सुरूपकाः ||
५८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
अधार्मिकामिमां वुद्धिं कुर्युर्मौर्ख्याद्धि केवलम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
अधार्मिकास्तु हन्तव्या इत्यहं प्रव्रवीमि वः ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
अधार्यमाणा स्रगिवोत्तमा यथा; न शोभसे सुन्दरि शोभना सती ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
अधार्याणि विशीर्णानि वसनानि द्विजातिभिः |
३३ क