chevron_left  अक्षौहिणीपतीन्दृष्ट्वाarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिणीपतीन्दृष्ट्वा भीमसेनेन पातितान् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिणीपरिवृताः पाण्डवानभिसंश्रिताः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्नवभिर्द्विजसत्तमः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्वृतः पञ्चभिराहवे ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिणीभिर्दशभिः स एनं समरेऽजय़त् ||
३३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिणीभिर्यान्देशान्यामि कार्येण केनचित् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
अक्षौहिणीभिस्तिसृभिर्मद्रेशं पर्यवारय़न् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिणीभ्यां सहितावागतौ पृथिवीपते ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिणीमभ्यधिकां शूराणामनिवर्तिनाम् |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिणीर्दशैकां च निर्जित्य निशितैः शरैः |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिणीर्महावाहुर्दश चैकां च केशव |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय २
ऋषय़ ऊचुः
अक्षौहिण्य इति प्रोक्तं यत्त्वय़ा सूतनन्दन |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यः समेतास्तु तव पुत्रस्य भारत |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यश्च संरव्धा धार्तराष्ट्रस्य भारत |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यस्तथा तिस्रो धार्तराष्ट्रस्य संहताः |
७५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यस्तु सप्तैताः समेता विजय़ाय़ वै ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यस्तु सप्तैव पाण्डवानामभूद्वलम् |
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यस्तु सप्तैव विविधध्वजसङ्कुलाः |
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्या च तेजस्वी यज्ञसेनो महावलः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्या च पाञ्चाल्यो यज्ञसेनो महामनाः |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
अक्षौहिण्या निरुत्साहाः शिष्टय़ा पर्यवारय़न् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्या महावीर्यः पाण्डवान्समुपागमत् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्या वृता वीरा दक्षिणं पक्षमाश्रिताः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्या समग्रा या वामपक्षोऽभवत्तदा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २
ऋषय़ ऊचुः
अक्षौहिण्याः परीमाणं रथाश्वनरदन्तिनाम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अक्षौहिण्याः प्रसङ्ख्यानं रथानां द्विजसत्तमाः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्याथ पाञ्चाल्यो दशभिस्तनय़ैर्वृतः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यैव सेनाय़ा दुर्योधनमुपागमत् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यैव सैन्यस्य धर्मराजमुपागमत् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यैव सैन्यस्य वृतः पार्थं समाश्रितः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यो दशैका च कौरवाणामभूद्वलम् ||
२३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यो दशैका च तव पुत्रस्य भारत |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
अक्षौहिण्यो दशैका च पार्थिवानां समागताः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यो दशैका च मदीय़ास्तव रक्षणे |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यो दशैका च वशगाः सन्तु तेऽनघ |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यो दशैका च सङ्ख्याताः सप्त चैव ह |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
अक्षौहिण्यो दशैका च सप्त चैव महाद्युते |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १९
धृतराष्ट्र उवाच
अक्षौहिण्यो दशैकां च व्यूढां दृष्ट्वा युधिष्ठिरः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
अक्षौहिण्यो द्विजश्रेष्ठाः पिण्डेनाष्टादशैव ताः ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
अक्षौहिण्यो महाराज दशाष्टौ च समागताः |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यो हताश्चाष्टौ दश चैव विशां पते |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यो हि ताः सर्वा रक्षिष्यन्ति जय़द्रथम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
अक्षौहिण्यो हि मे राजन्दशैका च समाहृताः |
६२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
अक्षौहिण्यो हि सप्तेमास्त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
अक्षौहिण्यो हि सप्तैव धर्मपुत्रस्य सङ्गताः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अक्ष्णोर्निमेषमात्रेण तदद्भुतमिवाभवत् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
अक्ष्णोर्निमेषमात्रेण पौलोमाः सगणा हताः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
अक्ष्णोर्निमेषमात्रेण सोऽन्यदादाय़ कार्मुकम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
अक्ष्णोर्निमेषमात्रेण सोऽन्यदादाय़ कार्मुकम् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
अक्षय़ं क्षपय़ेत्कश्चित्क्षत्रिय़ः क्षत्रिय़र्षभम् ||
२४ ख