chevron_left  अधारय़च्छत्रमस्यarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
अधारय़च्छत्रमस्य सात्यकिः सत्यविक्रमः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
अधिकं च तवैश्वर्यं तच्च त्वं नाववुध्यसे ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
अधिकं तव विज्ञानमधिका च गतिस्तव |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
अधिकं मार्जनात्तात तथैवाप्यनुलेपनात् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
अधिकं योजनशतं तस्यागमनकारणम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ||
५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
अधिकश्चाहमेवैक इत्यस्य मनसि स्थितम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
अधिकां स्म ततो वृत्तिमवर्तन्पाण्डवान्प्रति ||
६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
अधिकारे यदनृतं राजगामि च पैशुनम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
अधिकारेषु वर्तन्ते यथास्वं व्रह्मवादिनः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अधिक्षिप्तस्तु राधेय़ः शल्येनामिततेजसा |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
अधिजग्मुर्यथा वेदांस्तपसा व्रह्मवादिनः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
अधिज्यं तरसा कृत्वा गाण्डीवं व्याक्षिपद्धनुः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
अधिज्यं वलवत्कृत्वा गाण्डीवं व्याक्षिपद्धनुः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अधिज्यं वलवत्कृत्वा व्याक्षिपन्सुमहद्धनुः ||
४४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २४९
स्थाणुरु उवाच
अधिदैवनिय़ुक्तोऽस्मि त्वय़ा लोकेष्विहेश्वर ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अधिपौरुषमध्यात्ममधिभूताधिदैवतम् |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
अर्जुन उवाच
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं च मन्तव्यं चन्द्रमाश्चाधिदैवतम् ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं ततो रूपं सूर्यस्तत्राधिदैवतम् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं तथा गन्धो वाय़ुस्तत्राधिदैवतम् ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं तथा शव्दो दिशस्तत्राधिदैवतम् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं तथा शुक्रं दैवतं च प्रजापतिः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
अधिभूतं तथानन्दो दैवतं च प्रजापतिः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं तु कर्माणि शक्रस्तत्राधिदैवतम् ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं तु गन्तव्यं विष्णुस्तत्राधिदैवतम् ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं तु विज्ञेय़ं व्रह्मा तत्राधिदैवतम् ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं रसश्चात्र सोमस्तत्राधिदैवतम् ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
अधिभूतं विसर्गश्च मित्रस्तत्राधिदैवतम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
अधिभूतानि चान्तेऽहं तदिच्छंश्चास्मि भारत |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
अधिराजः स राजंस्त्वां शन्तनुः प्रपितामहः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
अधिराजाधिपं चैव दन्तवक्रं महाहवे |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
अधिरुह्य हय़ान्योधाः क्षिप्रं पद्भिरचोदय़न् ||
८६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
अधिरूढा नरव्याघ्रा नरवाहनमुत्तमम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
अधिरूढो द्विपश्रेष्ठमित्युवाच शतक्रतुः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
अधिरोह रथं मातर्गच्छावः स्वगृहानिति ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अधिरोहन्ति यं नित्यं पिशाचाः पुरुषं क्वचित् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
अधिरोहन्त्यनादृत्य हर्षुले पार्थिवे मृदौ ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
अधिरोहन्मय़ा दृष्टः सह भ्रातृभिरच्युत ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अधिलोक्याधिविज्ञानमधिय़ज्ञस्त्वमेव हि ||
१८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
अधिवासितशस्त्राश्च कृतकौतुकमङ्गलाः ||
३७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
अधिवासे सोऽप्सरसां नृत्यगीतविनादिते |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
अधिश्रित्य समिद्धेऽग्नौ वदराणि यशस्विनी ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
अधिष्ठाता मनो नित्यं भूतानां महतां तथा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
अधिष्ठातारमत्तारं पशूनां पुरुषं विदुः ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
अधिष्ठातारमव्यक्तमस्याप्येतन्निदर्शनम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
अधिष्ठातेति राजेन्द्र प्रोच्यते यतिसत्तमैः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
अधिष्ठानं मनस्त्वासीत्परिरथ्यं सरस्वती ||
७५ ख