अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
गाव ऊचुः
अध्रुवा चलचित्तासि ततस्त्वां वर्जय़ामहे ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
अध्रुवा सर्वमर्त्येषु ध्रुवं श्रीरुपलक्ष्यते |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
गाव ऊचुः
अध्रुवां चञ्चलां च त्वां सामान्यां वहुभिः सह |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अध्रुवे जीवलोके च स्थाने वाशाश्वते सति |
१४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
४
विदुर उवाच
अध्रुवे जीवलोकेऽस्मिन्यो धर्ममनुपालय़न् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
अध्रुवे जीविते मोहादर्थतृष्णामुपाश्रिताः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
अध्रुवो हि जय़ो नाम दैवं चात्र पराय़णम् |
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४४
व्राह्मण उवाच
अध्वक्लान्तस्य शय़नं स्थानक्लान्तस्य चासनम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
अध्वगाः परितप्येरंस्तृष्णार्ता दुःखभागिनः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
अध्वना कर्शितानां च न मांसाद्विद्यते परम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
अध्वन्यहमथापश्यमगस्त्यमृषिसत्तमम् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
अध्वर्यवस्त्रिषवणानि तन्वते; त्रय़ो लोकास्त्रीणि ज्योतींषि चाहुः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
शुनःसख उवाच
अध्वर्यवे दुहितरं ददातु; च्छन्दोगे वा चरितव्रह्मचर्ये |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
शक्र उवाच
अध्वर्यवे दुहितरं ददातु; च्छन्दोगे वा चरितव्रह्मचर्ये |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
अध्वर्युः कल्पकश्चापि हविः परमसंस्कृतम् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
अध्वर्युरपि निर्मोहः प्रचचार महामखे ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
अध्वर्युय़तिसंवादं तं निवोध यशस्विनि ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
अध्वा जरा देहवतां पर्वतानां जलं जरा |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
अध्वा जितो यानवता सर्वं शीलवता जितम् ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
अध्वा सूर्येण निर्दिष्टः कीटवच्च चरेन्महीम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
अध्वानं गतकश्चाय़ं प्राप्तश्चाय़ं गृहाद्गृहम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
अध्वानं सोऽतिचक्राम खेऽचरः खे चरन्निव ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
वासुदेव उवाच
अनक्षज्ञं च धर्मज्ञं सौवलेनाक्षवेदिना |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६
द्रुपद उवाच
अनक्षज्ञं मताक्षः सन्क्षत्रवृत्ते स्थितं शुचिम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
अनक्षज्ञं यथाश्रद्धं तेषु धर्मजय़ः कुतः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
अनक्षज्ञस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चय़ैः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
अनक्षत्रा अनाधृष्या दृश्यन्ते ज्योतिषां गणाः ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
अनग्निरनिकेतः स्याद्ग्राममन्नार्थमाश्रय़ेत् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
अनग्निरनिकेतश्च अगोत्रचरणो मुनिः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अनग्नय़श्च ये विप्रा मृतनिर्यातकाश्च ये |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
अनग्नय़ोऽनाहुतय़ो न च विप्रपुरस्कृताः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
अनघो विजय़ो जेता विश्वय़ोनिः पुनर्वसुः ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
अनङ्कुशं समारुह्य नगरं गन्तुमिच्छसि ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
अनङ्गपुत्रोऽतिवलो नीतिमानधिगम्य वै |
९८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
अनङ्गेन कृते दोषे नेमां त्वमिह राक्षस |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
अनड्वाहं सुव्रतं यो ददाति; हलस्य वोढारमनन्तवीर्यम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९०
राजो उवाच
अनड्वाहौ सुव्रतौ साधु दान्ता; वेतद्विप्राणां वाहनं वामदेव |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
अनतिक्रमणीय़ा हि व्राह्मणा वै द्विजोत्तम |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
अनतिक्रमणीय़ानि दैवतानि शचीपते |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
अनतिक्रमणीय़ैषा कृत्स्नैर्लोकैस्त्रिभिः सदा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अनतिक्रमणीय़ो हि धर्मराजस्य केशवः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
अनतिक्रमणीय़ो हि विधी राजन्कथञ्चन |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
अनतिक्रमणीय़ोऽय़ं कृतान्तस्याद्भुतो विधिः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
अनतीतामिमां रात्रिं यदि त्वां वीरमानिनम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
अनतीतोपधं हिंस्रं दुर्वुद्धिमवहुश्रुतम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
अनदद्भैरवं नादं वाहिन्याः प्रमुखे तव ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
अनध्याय़निमित्तेऽस्मिन्निदं वचनमव्रवीत् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
वसिष्ठ उवाच
अनध्याय़परो लोके शुनः स परिकर्षतु |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
अनध्याय़ेषु ये विप्राः स्वाध्याय़ं नैव कुर्वते |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
जमदग्निरु उवाच
अनध्याय़ेष्वधीय़ीत मित्रं श्राद्धे च भोजय़ेत् |
२५ क