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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
अत्रिरु उवाच
अनध्याय़ेष्वधीय़ीत विसस्तैन्यं करोति यः ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
अनन्त देवेश जगन्निवास; त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अनन्त विदितप्रज्ञ नित्यं भूतविभावन |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
अनन्तं वत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किञ्चन |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
अनन्तं वत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किञ्चन |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय १५
सूत उवाच
अनन्तकल्पमुद्विद्धं सुराः सर्वे महौजसः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अनन्तकल्पा ध्वजिनी भूत्वा ह्येषां महात्मनाम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
अनन्ततेजा गोविन्दः शत्रुपूगेषु निर्व्यथः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अनन्ततेजाः सुमनाः समाहितः; स्वतेजसा सूर्य इवावभासते ||
१०२ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
अनन्तदन्तस्त्वष्टा च विश्वकर्मा च तुम्वुरुः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३२
व्रह्मो उवाच
अनन्तभोगः परिगृह्य सर्वां; यथाहमेवं वलभिद्यथा वा ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तमचलं देवं हंसं नाराय़णं प्रभुम् |
८६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
इन्द्र उवाच
अनन्तमाय़ामितसत्त्ववीर्यं; नाराय़णं ह्यादिदेवं पुराणम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
अनन्तमिति कृत्वा स नित्यं केवलमेव च |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भृगुरु उवाच
अनन्तमेतदाकाशं सिद्धचारणसेवितम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अनन्तरं च काम्वोजो जलसन्धश्च मारिष |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अनन्तरं च निहते द्रोणे व्रह्मविदां वरे |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तरं च राजानं भीमसेनमथार्जुनम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २२८
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तरं च राधेय़ः शकुनिश्च विशां पते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
अनन्तरं त्वय़ा चाहं वन्धनीय़ा महीपते ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तरं यय़ातिस्तु पूजय़ामास भार्गवम् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तरं व्राह्मणेभ्यः क्षत्रिय़ा जह्रिरे वसु |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
अनन्तरः क्षत्रिय़स्य इति वै विचिकित्ससे ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तरत्नान्यादाय़ आजहार महाक्रतून् |
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अनन्तरथनागाश्वमशोभत महद्वलम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
सूत उवाच
अनन्तरमहं मन्ये तक्षकाय़ दुरात्मने |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन्देवदानववर्जिते |
३ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन्भ्रमाम्येकोऽहमादृतः ||
७८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
अनन्तरूपा ध्वजिनी त्वदीय़ा; नरेन्द्र भीमा न तु पाण्डवानाम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वय़म्भुवः |
१३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भय़ापहः |
११३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अनन्तविजय़ं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अनन्तविजय़ं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं; सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
अनन्तवीर्येण च केशवेन; नाराय़णेनाप्रतिमेन गुप्तम् ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
अनन्ता अधना एव स्वाध्याय़ेन दिवं गताः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
अनन्तेनाप्रमेय़ेन स्रोतसा सर्वहारिणा ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तो द्वादशभुजस्तथा कृष्णोपकृष्णकौ ||
५२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्तो भगवान्देवः प्रविवेश रसातलम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
अनन्तो भगवान्देवो यतो नाराय़णस्ततः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकदोऽग्रजः |
१०८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
अनन्त्यं तं सुखं मत्वा श्रिय़मन्यः परीक्षते ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
अनन्दनमधर्मज्ञं द्विषतां हर्षवर्धनम् ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
अनन्यः पार्थ मत्तस्त्वमहं त्वत्तश्च भारत |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
अनन्यकर्म दैवं हि जागर्ति स्वपतामपि ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तुः सा धर्मचारिणी ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
अनन्यपूर्वां राजेन्द्र त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणीम् ||
१६ ख