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शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
शक्रेण चाप्यनुज्ञातं पुण्यं प्राणान्विमुञ्चताम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रेण दत्तानि ददौ महात्मा; महाधनान्युत्तमरूपवन्ति |
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १६२
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रेण य इमं विद्वानधीय़ीत समाहितः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
शक्रेण यत्र भागार्थे दैवतेषु प्रकल्पिताः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
शक्रेणेव यथा दैत्यान्हन्यमानान्महाहवे ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
शक्रो भृशं सुसुखी पार्थिवेन्द्र; प्रीतिं चेच्छत्यजरां वै त्वय़ा सः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
शक्रो यथा प्रतिद्वन्द्वो दिवि देवेषु विश्रुतः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
भीष्म उवाच
शक्रो ह्यज्ञातरूपेण जटी भूत्वा रजोरुणः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
शक्रोपमाश्च वहवः पाञ्चालानां रथव्रजाः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३०
सूत उवाच
शक्रोऽप्यमृतमाक्षिप्य जगाम त्रिदिवं पुनः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
शक्रोऽसि मरुतां देव पितॄणां धर्मराडसि |
१६० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
शक्ष्यन्ति हि महावाहो पाण्डवाः सृञ्जय़ैः सह |
११ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
शक्ष्यसे ता गिरः सत्याः कर्तुं मय़ि नरेश्वर |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
शङ्कमानः स तन्मिथ्या वीर्यज्ञः स्वसुतस्य वै |
७५ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्कमानः सुतं गङ्गामव्रवीद्दर्शय़ेति ह ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
शङ्कमाना नलं तं वै केशिनीमिदमव्रवीत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
शङ्कमानाः फलं यज्ञे ये यजेरन्कथञ्चन |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
शङ्कमानो भृगोर्भार्यां पुनः पुनरपृच्छत ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
शङ्करं च महासेनं वाणप्रिय़हितैषिणम् |
८६ क
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
शङ्करं भवमीशानं शूलपानिं पिनाकिनम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
शङ्करस्त्वसृजत्तात प्रजाः स्थावरजङ्गमाः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
शङ्करस्योमय़ा सार्धं संवादं प्रत्यभाषत ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
शङ्कराणि त्रिवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
शङ्कितत्वं च सर्वस्य प्रमादस्य च वर्जनम् ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
शङ्कितस्त्वमहं भीतः परे छिद्रानुदर्शिनः |
८० क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्किताः सर्वराजानः परिवव्रुर्वृकोदरम् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
शङ्किताश्चेप्सवश्चैव पितृपैतामहं पदम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
शङ्कुकर्णः पिङ्गलकः कुठारमुखमेचकौ |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
शङ्कुकर्णेश्वरं देवमर्चय़ित्वा युधिष्ठिर |
८७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्कुकर्णो निकुम्भश्च पद्मः कुमुद एव च |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
शङ्कुकर्णो महावक्त्रः पलितो घोरदर्शनः |
११० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
शङ्कुस्त्रिशङ्कुः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ||
९३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
शङ्के जय़द्रथं पार्थो नैव प्राप्स्यति मानद ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
शङ्के दैवस्य तत्कर्म पौरुषं येन नाशितम् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
शङ्खं च पूरय़ामास मुहुर्मुहुररिन्दमः |
६० क
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
शङ्खं चैव निखर्वं च समुद्रं चात्र पण्यताम् |
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
शङ्खं दध्मौ च समरे सिंहनादं ननाद च ||
८८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
शङ्खं दध्मौ महावाहुर्हर्षय़न्सर्वपाण्डवान् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
शङ्खं प्रध्माप्य हर्षेण सुहृदः पर्यहर्षय़म् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
शङ्खं भद्रासनं छत्रं वराश्वा वरवारणाः |
८६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
शङ्खः क्रोधात्प्रजज्वाल हविषा हव्यवाडिव ||
४३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
शङ्खः पुत्रो विराटस्य निधिस्त्वं च जनार्दन ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खकुम्भस्वना चैव भङ्गदा च महावला |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खचक्रगदाशक्तिशार्ङ्गलाङ्गलनन्दकाः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खचक्रगदाहस्तं यदा द्रक्ष्यसि केशवम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च भेरीणां च सहस्रशः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च समन्तात्सस्वनुर्भृशम् ||
४५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिघोषैश्च वारणानां च वृंहितैः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
शङ्खदुन्दुभिनादश्च तुमुलः सर्वतोऽभवत् ||
३ ख