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शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
अनर्थांश्च वहूनन्यान्प्रसृजत्यात्मदोषजान् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
अनर्थांश्चार्थरूपेण अर्थांश्चानर्थरूपतः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
अनर्थाः क्षिप्रमाय़ान्ति वाग्दुष्टं क्रोधनं तथा ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
अनर्थाचरितं तात परस्वस्पृहणं भृशम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
युधिष्ठिर उवाच
अनर्थानामधिष्ठानमुक्तो लोभः पितामह |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
अनर्थार्थमथाप्यन्यत्तत्सर्वं ह्यर्थलक्षणम् |
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
अनर्थाश्चार्थरूपेण अर्थाश्चानर्थरूपिणः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
अनर्थित्वान्मनुष्याणां भय़ात्परिजनस्य च |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं स्वमर्थं नानुतिष्ठसि ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
अनर्थे चार्थसञ्ज्ञस्त्वं किमर्थं नाववुध्यसे ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
जनमेजय़ उवाच
अनर्थे जातनिर्वन्धं परार्थे लोभमोहितम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
अनर्थैर्विप्रलुप्यन्ते स गच्छति पराभवम् ||
१०५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्थो राज्यरूपेण त्यज्यतामसुखावहः ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्थो ह्यर्थसङ्काशस्तथार्थोऽनर्थदर्शनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
पिङ्गलो उवाच
अनर्थोऽपि भवत्यर्थो दैवात्पूर्वकृतेन वा |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
अनर्महासी सोन्मादस्तिर्यक्प्रेक्षी महास्वनः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्मे चापि हसनं द्वारि स्थानमभीक्ष्णशः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ५६
जनमेजय़ उवाच
अनर्हः परमं क्लेशं सोढवान्स युधिष्ठिरः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
अनर्हता राजपुत्रेण तेन; त्वय़ा दीव्याम्यप्रिय़वत्प्रिय़ेण ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
अनर्हता राजपुत्रेण तेन; दीव्याम्यहं भीमसेनेन राजन् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
अनर्हता लोकवीरेण तेन; दीव्याम्यहं शकुने फल्गुनेन ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
अनर्हतीं कुले जातां सर्वधर्मानुचारिणीम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्हतीं द्रौपदीं चापि दृष्ट्वा; सुदुःखिताश्चुक्रुशुरार्तनादम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अनर्हते च यो दद्याद्वृषलीपत्युरेव च ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्हते यद्ददाति न ददाति यदर्हते |
९ क
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
अनर्हन्तं तथाभूतं विललाप सुदुःखितः ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्हमर्हवत्कृष्ण वध्यास्त इति मे मतिः |
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
अनर्हमाणः कौन्तेय़ः कर्मणस्तस्य तत्फलम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
अनर्हमाणास्तं भावं त्रय़ोदश समाः परैः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
अनर्हा धर्षणं हीमे जीवमानेषु पाण्डुषु ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
द्रौपद्यु उवाच
अनर्हा वरमादातुं तृतीय़ं राजसत्तम ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
अनर्हाः प्रार्थय़िष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुतिं यथा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
अनर्हानपि चैवान्यान्मन्यते श्रीमतो जनान् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
अनर्हानेव तु वधे धर्मय़ुक्तान्विकर्मणा |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
अनर्हार्हापरिज्ञानाद्दानधर्मोऽपि दुष्करः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
अनर्हाश्चार्हतां प्राप्ताः सन्तः स्तुत्वा तमेव ह |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
अनर्हे व्राह्मणे दत्तमज्ञानात्तन्न दूषकम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
अनलश्चानिलश्चैव विशालाक्षोऽथ कुण्डली ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
अनलानिलय़ोस्तुल्यं तेजसा च वलेन च ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
अनलाय़ाः शुकी पुत्री कद्र्वास्तु सुरसा सुता ||
६६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
अनल्पेन प्रय़त्नेन निर्मितं विश्वकर्मणा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
अनवज्ञा पितुर्युक्ता धारणं मातृरक्षणम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
अनवज्ञातशीलस्य स्वाधीना पृथिवी नृप ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
कर्ण उवाच
अनवद्या वै पतिषु कामवृत्ति; र्नित्यं दास्ये विदितं वै तवास्तु ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अनवद्या ह्यसम्वुद्धाः प्रविष्टाः शत्रुसद्म तत् |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
अनवद्यानि वक्त्राणि तपत्यसुखरश्मिवान् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अनवद्यान्गय़ांश्चैव पशुभूमिं च सर्वशः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
अनवद्यामनुवशामनूनामरुणां प्रिय़ाम् |
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
अनवसितमनन्तदोषपारं; नृषु विहरामि विनीतरोषतृष्णः ||
३६ ख