chevron_left  जितेन्द्रिय़ाय़ैतदसंशय़ंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
जितेन्द्रिय़ाय़ैतदसंशय़ं ते; भवेत्प्रदेय़ं परमं नरेन्द्र ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
जितेन्द्रिय़ैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७
अगस्त्य उवाच
जितेन्द्रिय़ो जितामित्रः स्तूय़मानो महर्षिभिः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १९७
स्त्र्यु उवाच
जितेन्द्रिय़ो धर्मपरः स्वाध्याय़निरतः शुचिः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
जितेन्द्रिय़ो नरपतिर्वाधितुं शक्नुय़ादरीन् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
जितेन्द्रिय़ो वीतरागो जुह्वानो जातवेदसम् |
१०४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
जितेय़मवनिः कृत्स्ना धर्मेण च युधिष्ठिर ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
जितो दुर्योधनः सङ्ख्ये पाण्डवैर्भीमविक्रमैः |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १
कृष्ण उवाच
जितो निकृत्यापहृतं च राज्यं; पुनः प्रवासे समय़ः कृतश्च ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
जितोऽस्मि भीष्मेण सुमन्दवुद्धि; रित्येव वाक्यं सहसा व्यमुञ्चत् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
जितोऽस्मीति भृगुश्रेष्ठ भृगवो ह्यतिरोषणाः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
जितोऽहं पूर्वकं नाम मुञ्चाम्यङ्गारपर्णताम् |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा गाश्च समादाय़ ध्रुवमागमनं भवेत् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
जित्वा च पुष्करं राजा प्रहसन्निदमव्रवीत् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
जित्वा च मागधान्सर्वान्काशीनथ च कोसलान् |
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
जित्वा च वहुभिर्यज्ञैर्यक्ष्यध्वं भूरिदक्षिणैः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा चारीन्नरश्रेष्ठ तप्यते किं भवान्भृशम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा तान्सिन्धुसौवीरान्द्रौपदीं चाहृतां पुनः ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
जित्वा तु द्रुपदं द्रोणः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
जित्वा तु पृथिवीं दैत्यौ निःसपत्नौ गतव्यथौ |
१ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा त्रिगर्तान्सङ्ग्रामे गाश्चैवादाय़ केवलाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
जित्वा त्वद्य वरारोहां दमय़न्तीमनिन्दिताम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
जित्वा परस्वमाहृत्य राज्यं वा यदि वा वसु |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
जित्वा पाण्डुसुतान्युद्धे भीमसेनपुरोगमान् |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
जित्वा पार्थिवसङ्घातमपि ते वहुशः श्रुतम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा ममत्वं व्रुवते पुत्रा इव पितुर्धने |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो व्राह्मण्याद्गौरवेण च ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
जित्वा यत्र महाप्राज्ञ विष्णुना प्रभविष्णुना |
९१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
जित्वा यवनकाम्वोजान्युय़ुधानस्ततोऽर्जुनम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
जित्वा रथसहस्राणि तावकानां महारथाः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
जित्वा रिपुगणांश्चैव पारय़त्वर्जुनो व्रतम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
जित्वा वज्रधरं सङ्ख्ये सहस्राक्षं शचीपतिम् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
जित्वा वा पृथिवीं भुङ्क्ष्व हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा विसर्जय़ामास जीवन्तं नृपसत्तमम् |
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
जित्वा वै क्षत्रिय़ान्सर्वान्व्राह्मणेषु प्रतिश्रुतम् ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा शत्रूञ्जितः पश्चात्पर्यदेवय़दातुरः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
जित्वा शत्रून्फलमाप्तं महन्नो; मास्मान्क्षत्तः परुषाणीह वोचः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा षष्टिसहस्राणि रथिनामुग्रधन्विनाम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा सङ्ग्रामान्पालय़ित्वा च राष्ट्रं; सोमं पीत्वा वर्धय़ित्वा प्रजाश्च |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा सङ्ग्रामान्पालय़ित्वा प्रजाश्च; सोमं पीत्वा तर्पय़ित्वा द्विजाग्र्यान् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
जित्वा सुवहुशः शत्रून्प्रेषय़ित्वा च मृत्यवे |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
जित्वारीन्क्षत्रधर्मेण प्राप्य राज्यमकण्टकम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
जित्वेह सुखमाप्नोति हतः प्रेत्य महत्फलम् ||
६० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
जिष्णुं त्रैगर्तका योधास्त्वरिताः पर्यवारय़न् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
जिष्णुः सहिष्णुर्धृष्णुश्च स एनं पालय़िष्यति |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
जिहीर्षवोऽमृतं दैत्याः शक्राग्निभ्यामिवावशाः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
जिह्मनासानुजङ्घाश्च दूरगा दूरपातिनः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
जिह्माक्षाः प्रललाटाश्च निर्मांसहनवोऽपि च |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
जिह्मैरुपाय़ैर्वहुभिर्न ते लज्जा न ते घृणा ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
जिह्मय़ोधीति लोकेऽस्मिन्ख्यातिं यास्यति पाण्डवः ||
२३ ख