कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
स तुष्टमवृणोद्देवं वापी भवतु नः पुरे |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
स तुष्येद्दशभागेन ततस्त्वन्यो दशावरैः ||
१५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
स तूत्तमौजा निशितैः पृषत्कै; र्विव्याध खड्गेन च भास्वरेण |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
स तूत्थाय़ महावाहुरुपसान्त्व्य च ताञ्जनान् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
स तूर्यशतसङ्घानां भेरीणां च महास्वनैः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
स तूष्णीं चिन्तय़न्वीरो देवराजः प्रतापवान् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
विदुर उवाच
स ते गुह्यान्प्रकाशांश्च सर्वान्हृदय़संश्रय़ान् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
स ते दास्यति राजर्षिर्यजमानोऽर्थिने धनम् ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३४३
अतिथिरु उवाच
स ते परमकं धर्मं नमिथ्या दर्शय़िष्यति ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
स ते पुत्रान्पृच्छति प्रीय़माणः; कच्चित्पुत्रैः प्रीय़से नप्तृभिश्च |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स ते प्रतिजग्राहोत्तङ्कः |
१६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
स ते भ्राता सखा चैव कथमद्य धनञ्जय़ः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
स ते मन्त्रसहाय़ः स्यात्सर्वावस्थं परीक्षितः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
स ते वंशकरः पुत्रो भविष्यति नृपाधम ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
स ते वक्ष्यति धर्मज्ञः सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्ववित् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स ते वक्ष्यति मोक्षार्थं निखिलेन विशेषतः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
स ते विक्रमशौण्डीरो रणे पार्थं विजेष्यति |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
स ते विद्यात्परं मन्त्रं प्रकृतिं चार्थधर्मय़ोः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
स ते विप्रः सह वज्रेण वाहु; मपागृह्णात्तपसा जातमन्युः ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
स ते संनतिमानेकः स्नेहतः शत्रुतापनः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
स ते संशय़ितस्तात आत्मा च भरतर्षभ ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
स ते सर्वरहस्येषु संशय़ान्मनसि स्थितान् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
स ते सौहृदमास्थाय़ किञ्चिद्वक्ष्यामि नारद |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
स तेजसा शस्त्रहतेन पूतो; महाहवे देहवरं विसृज्य |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
स तेजस्वी तथा तेन भुजगेन वशीकृतः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
स तेन कर्मणा स्पर्धन्पृथिवीं पृथिवीपते |
२ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
स तेन कर्शितो राजा दीर्घकालमनात्मवान् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५३
भीष्म उवाच
स तेन कृतसंस्कारो धर्ममेवोपतस्थिवान् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन कोपेन विदीर्यमाणः; करं करेणाभिनिपीड्य वीरः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
स तेन तपसा तात व्रह्मभूतो यदाभवत् |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन तपसा लोकान्विजिग्ये दुर्लभान्परैः |
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन तीर्थेन तु सागरस्य; पुनः प्रय़ातः सह सोदरीय़ैः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स तेन नागप्रवरेण पार्थिवो; भृशं जगाहे द्विषतामनीकिनीम् |
५८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
स तेन नागप्रवरेण राज; न्नभ्युद्ययौ पाण्डुसुतान्समन्तात् |
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन निहतोऽरण्ये मन्यमानेन वै मृगम् ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
स तेन पतगेन्द्रेण पक्षतुण्डनखैः क्षतः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन प्रेषितो राज्ञा मेघवन्निनदन्मुहुः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
स तेन भृशसंविद्धो निषसाद रथोत्तमे ||
२९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
स तेन भ्राजते राजन्गोवृषेण महारथः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
हिडिम्वो उवाच
स तेन मम कान्तेन तव पुत्रेण धीमता |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
स तेन मार्गेण तदा नागलोकं विवेश ह |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन युज्यत्यवशः फलेन; मोक्षः कथं स्यात्पुरुषस्य तस्मात् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
स तेन राक्षसश्रेष्ठः सरथः साश्वसारथिः |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन राज्ञातिरथेन विद्धो; विगाहमानो ध्वजिनीं कुरूणाम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
स तेन वरदानेन दिव्येनास्त्रवलेन च |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
स तेन वरदानेन लव्धवान्भूरिदक्षिणम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
स तेन वर्मणा गुप्तः प्राय़ाद्वृत्रचमूं प्रति ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
स तेन वलिना वीरश्छिद्यमान इव द्रुमः |
६२ क
विराट पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
स तेन वाणाभिहतस्तरस्वी; दुर्योधनेनोद्धतमन्युवेगः |
५ क