उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
आ केशग्रहणान्मित्रमकार्यात्संनिवर्तय़न् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
आ केशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्येषु कुवर्त्मसु ||
९० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
आ केशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्यो वक्तुमिच्छसि ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
आ गर्भादनुकृन्तन्तश्चेरुश्चैव वसुन्धराम् ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
आ गर्भादनुकृन्तन्तो दैवदण्डनिपीडिताः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
आ गुल्फेभ्योऽवसीदन्त नराः शोणितकर्दमे |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
आ गोपालाविपालेभ्य आचक्षाणाः परन्तपाः |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
आ गोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
आ गोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
आ गोपालाविपालेभ्यो द्रवन्तो नगरं प्रति |
७३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
आ गोपालाविपालेभ्यो नन्दमानं युधिष्ठिरम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
आ चक्षुर्विषय़ाच्चैनं ददर्श च पुनः पुनः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
अणीमाण्डव्य उवाच
आ चतुर्दशमाद्वर्षान्न भविष्यति पातकम् |
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
आ जन्ममरणाद्यस्तु व्रह्मचारी भवेदिह |
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
आ जातितो यश्च गवां नमेत; इदं फलं शक्र निवोध तस्य ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
आ तुम्वादवसीदन्ति रथचक्राणि मारिष |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
आ देवात्त्वत्समं तेषां न पश्यामि शृणोमि वा ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
आ देहपतनाद्गङ्गामुपास्ते यः पुमानिह ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
आ देहादप्रमादाच्च देहान्ताद्विप्रमुच्यते ||
२१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
आ पाञ्चालेभ्यः कुरवो नैमिषाश्च; मत्स्याश्चैवाप्यथ जानन्ति धर्मम् |
७५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
आ पृष्ठतापाज्जप्त्वा स परिवृत्य यतव्रतः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
आ पृष्ठतापात्स्वाध्याय़े युक्तास्तान्पूजय़ाम्यहम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
आ पृष्ठतापादादित्यमुपतस्थे स वीर्यवान् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
आ प्रजानां निसर्गाद्वै नोद्भिद्यति न सर्पति ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
आ मत्स्येभ्यः कुरुपाञ्चालदेश्या; आ नैमिषाच्चेदय़ो ये विशिष्टाः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
आ मातृस्तनपानाच्च यावच्छय़्योपसर्पणम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
आ विमोक्षाच्छरीरस्य सोऽनुतिष्ठेद्यथाविधि ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
आ व्रह्मभवनादेते दोषा मौद्गल्य दारुणाः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
आ व्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
आ सिद्धेरा प्रजासर्गादात्मनो मे गतिः शुभा ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
आकरं सर्वरत्नानामालय़ं वरुणस्य च |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
आकरः सर्वरत्नानां सिद्धचारणसेवितः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
आकराणां विनाशैश्च परराष्ट्रं विनाशय़ेत् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
आकरे लवणे शुल्के तरे नागवने तथा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
आकर्णपलितः श्यामो वय़साशीतिकात्परः |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
आकर्णपलितः श्यामो वय़साशीतिपञ्चकः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
आकर्णपलितः श्यामो वय़साशीतिपञ्चकः |
१०३ क
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
आकर्णपूर्णं च धनुर्विकृष्य; विव्याध वाणैरथ सूतपुत्रम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
आकर्णपूर्णं चिक्षेप वज्रं वज्रधरो यथा ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
आकर्णपूर्णमाचार्यो वलवानभ्यवासृजत् ||
६१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
आकर्णपूर्णाय़तचोदितेन; भल्लेन विव्याध ललाटमध्ये ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
आकर्णपूर्णाय़तसम्प्रय़ुक्तैः; शरैस्तदा संय़ति तैलधौतैः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
आकर्णपूर्णेन दृढाय़सेन; वाणेन विव्याध महाजवेन ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
आकर्णपूर्णैरभ्यघ्नन्वाह्वोरुरसि चानदत् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णैर्वेगितैस्तिग्मतेजनैः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
आकर्णमुक्तैरभ्यघ्नंस्ते हताः प्रापतन्भुवि ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
आकर्णमुक्तैरिषुभिः कर्णस्य चतुरो हय़ान् |
७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
आकर्णाद्दारितास्यश्च तीक्ष्णदंष्ट्रः करालवान् |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
आकर्षः कुन्तलश्चैव वानवास्यान्ध्रकास्तथा ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
आकर्षन्त महाराज जालेनाथ यदृच्छय़ा ||
१८ ख