आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्ष्व मम तत्सर्वं किमर्थं चेह तिष्ठसि ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्ष्व मां धृतराष्ट्राय़ द्वाःस्थ; उपागतं पाण्डवानां सकाशात् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
आचक्ष्व मां सुखिनं काल्यमस्मै; प्रवेश्यतां स्वागतं सञ्जय़ाय़ |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
आचक्ष्व मे चारुसर्वाङ्गि सर्वं; त्वय़ानुशिष्टो न च्यवेय़ं स्वधर्मात् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
आचक्ष्व मे तं परमं विशोकं; मोक्षं परं यं प्रविशन्ति धीराः ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
९
विराट उवाच
आचक्ष्व मे तत्त्वममित्रकर्शन; न वैश्यकर्म त्वय़ि विद्यते समम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
आचक्ष्व मे तद्द्विज यावदेता; न्निहन्मि सर्वांस्तव दुःखकर्तॄन् ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
धृतराष्ट्र उवाच
आचक्ष्व मे महावाहो सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
धृतराष्ट्र उवाच
आचक्ष्व मे महाय़ुद्धं भीष्मस्याहवशोभिनः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९
धृतराष्ट्र उवाच
आचक्ष्व मे यथातत्त्वं ये च पर्वतवासिनः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
आचक्ष्व मे विस्तरेण हरिवर्षं तथैव च ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
आचक्ष्व मेऽद्य सङ्ग्रामं यथापूर्वमरिन्दम |
३० क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
आचक्ष्व यद्धृतं द्रव्यमवशिष्टं च यद्वसु ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
आचक्ष्व वन्धूंश्च पतिं कुलं च; तत्त्वेन यच्चेह करोषि कार्यम् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
शकुनिरु उवाच
आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय़ यदि तेऽस्त्यपराजितम् ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
शकुनिरु उवाच
आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय़ यदि तेऽस्त्यपराजितम् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
आचक्ष्व विषय़ं राजन्यावांस्तव वशे स्थितः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
आचख्याविव तद्युद्धं विजय़ं चात्मनो महत् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
आचख्युः कवय़ः केचित्सम्प्रत्याचक्षते परे |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
आचख्युः सज्जमित्येव पार्थाय़ामिततेजसे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
आचख्युर्निहतं चैव स्वेनामात्येन तं नृपम् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
आचख्युस्तस्य संहृष्टाः स्त्रिय़ः कन्याश्च वेश्मनि |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
आचख्युस्ते तु रामाय़ महीं सागरमेखलाम् |
२३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
आचख्यौ कर्म तत्सर्वं हृष्टः संहर्षय़न्विभो ||
१४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
आचख्यौ कर्म वैतानं तदा पुत्रफलाय़ वै ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
आचख्यौ च यथा वृत्तं सर्वमात्मनि भारत |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
आचख्यौ चेष्टितं जिष्णोः सभापालः सहानुगः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
आचख्यौ तत्समासेन यद्वृत्तं कुरुसंसदि ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
आचख्यौ तद्यथा धर्मो वहूनामेकपत्निता ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
आचख्यौ तद्यथान्याय़ं परिचर्यां च भारत ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
आचख्यौ धृतराष्ट्राय़ यद्वृत्तं कुरुजाङ्गले ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
आचख्यौ धृतराष्ट्राय़ राजा दुर्योधनस्तदा ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
आचख्यौ परिविश्रान्तो राज्ञे सर्वमशेषतः |
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
आचचक्षे ततः सर्वं गोत्रनामादि भारत ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
आचचक्षे ततः सर्वमितिहासं पुरातनम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
आचचक्षे महावाहो भर्त्रे कन्यां शिखण्डिनीम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
आचचक्षे यथा वृत्तं सुवर्णष्ठीविनं प्रति ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
आचचक्षे यथातत्त्वं माय़ां शक्रस्य भारत ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
सूत उवाच
आचचक्षे यथावृत्तं तत्सर्वं सर्ववेदवित् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
आचचक्षे यथावृत्तं राज्ञः सर्वमशेषतः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
आचचक्षे हय़ज्ञाने सैरन्ध्री कौशलं तव ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
आचम्य चैव हस्तेन परिस्राव्य तथोदकम् |
९३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
आचरत्यात्मनः श्रेय़स्ततो याति परां गतिम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
आचरन्सर्वभूतेषु प्रिय़ो भवति सर्वदा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
आचरिष्यसि चेत्कर्म महतोऽर्थानवाप्स्यसि |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
आचरेय़ुर्यदा सेनां तदा सिद्धिरनुत्तमा ||
७ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
आचष्ट तद्यथावृत्तं वृष्ण्यन्धकजनं प्रति ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
आचष्ट तमभिप्राय़ं केशवाय़ महात्मने ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
आचष्ट निहतं भीष्मं भरतानाममध्यमम् ||
२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
आचष्ट मौसले वृष्णीनन्योन्येनोपसंहृतान् ||
१ ख