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अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
आचष्ट विधिवत्सर्वं यत्तच्छृणु विशां पते ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४
शौनक उवाच
आचष्टैतद्यथाख्यानं पिता ते त्वं तथा वद ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५७
भीष्म उवाच
आचार इत्यनाचाराः कृपणाः फलहेतवः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
आचारं चैव शौचं च स्वर्गाय़ विदधे प्रभुः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
आचारं तत्त्वतो वेत्तुमिच्छामीति पुनः पुनः ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
आचारं तत्र सम्प्रेक्ष्य प्रीतः शिल्पिनमव्रवीत् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
आचारं प्रतिगृह्णन्त्या सिद्धिः प्राप्तेय़मुत्तमा ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
आचारः कारणं चैव धर्मश्चैव त्रय़ं पुनः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
आचारपालनं चैव द्वितीय़ं शिष्टलक्षणम् ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ||
१३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आचारप्रभवो धर्मो धर्मादाय़ुर्विवर्धते ||
१४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
आचारमेव मन्यन्ते गरीय़ो धर्मलक्षणम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आचारलक्षणो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
आचारविधिय़ोगश्च सत्यस्य च परा गतिः ||
२०३ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
आचारश्च सतां धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
आचारसम्भवो धर्मो धर्माद्वेदाः समुत्थिताः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
युधिष्ठिर उवाच
आचारस्य विधिं तात प्रोच्यमानं त्वय़ानघ |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
आचाराच्छ्रिय़माप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
आचाराज्जाजले प्राज्ञः क्षिप्रं धर्ममवाप्नुय़ात् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
आचाराणामनैकाग्र्यं सर्वेषामेव लक्षय़ेत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आचारात्कीर्तिमाप्नोति पुरुषः प्रेत्य चेह च ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
आचारादेव पुरुषस्तथा कर्मसु वर्तते ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आचाराद्वर्धते ह्याय़ुराचारो हन्त्यलक्षणम् ||
१४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
आचारानिह सत्यस्य यथावदनुपूर्वशः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
आचाराल्लभते धर्ममाचाराल्लभते धनम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आचाराल्लभते ह्याय़ुराचाराल्लभते श्रिय़म् |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८२
सुवर्चा उवाच
आचारेण च संय़ुक्ता तथा जीवति सत्यवान् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २८२
भारद्वाज उवाच
आचारेण च संय़ुक्ता तथा जीवति सत्यवान् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
आचारैर्मुनिभिर्दृष्टैः पूजय़ामास भारत ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिन्सन्तो व्यवस्थिताः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः |
१४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
आचार्य इष्टोऽनपगो विधेय़ो; वेदानीप्सन्व्रह्मचर्यं चचार |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
आचार्य उक्तो भवता हतः कुञ्जर इत्युत ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४६
अश्वत्थामो उवाच
आचार्य एव क्षमतां शान्तिरत्र विधीय़ताम् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
आचार्य एष वै द्रोणः सर्वशस्त्रभृतां वरः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
आचार्य केन कालेन पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
दुर्योधन उवाच
आचार्य त्रिविधा योनी राज्ञां शास्त्रविनिश्चय़े |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
आचार्य प्रणिपत्यैष पृच्छामि त्वां नमोऽस्तु ते ||
५८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्य शारद्वतय़ोः सुशुक्ले; कर्णस्य पीतं रुचिरं च वस्त्रम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
आचार्य शीघ्रं कलशं जलपूर्णं समानय़ ||
३६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
आचार्य सततं त्वं हि हितकामो ममानघ |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
आचार्यं पूजय़ित्वा च केतुं सर्वधनुष्मताम् |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यं पृष्ठतः कृत्वा तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
१९ ग
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
आचार्यं मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुपुङ्गव |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
आचार्यं मा विगर्हस्व शक्त्या युध्यत्यसौ द्विजः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
धृतराष्ट्र उवाच
आचार्यं ये च तेऽरक्षन्दुर्योधनपुरोगमाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
आचार्यं योगमास्थाय़ व्रह्मलोकमरिन्दमम् ||
४५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
आचार्यं राजपुत्राणां सततं शूरमानिनम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
आचार्यं वरय़े त्वाहमस्त्रार्थं त्रिदशेश्वर ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
आचार्यं शरवर्षेण रथे सादय़ता कृपम् ||
२३ ख