chevron_left  आचार्यश्चarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यश्च तथा द्रोणः कृपः शारद्वतस्तथा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
आचार्यश्च महेष्वासः सर्वपार्थिवपूजितः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
धृतराष्ट्र उवाच
आचार्यश्च रणे नित्यं प्रिय़ः पार्थस्य सञ्जय़ ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
आचार्यस्य च पाण्डूनां व्राह्मणस्य यशस्विनः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
आचार्यस्य पितुश्चैव सख्युराप्तस्य चातिथेः |
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
आचार्यस्य प्रिय़ं कुर्यात्प्राणैरपि धनैरपि |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
आचार्यस्यार्धचन्द्रेण क्रुद्धश्चिच्छेद कार्मुकम् |
३० क
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
आचार्यस्यैष पुत्रो वै अश्वत्थामा महारथः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्या ऋत्विजश्चैव पूजनीय़ा नराधिप ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्या मोक्षशास्त्रे च मोक्षधर्मप्रवर्तकाः ||
६६ ख
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्या वै कारुणिकाः प्राज्ञाश्चापाय़दर्शिनः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्या व्राह्मणाश्चैव ऋत्विजो भ्रातरश्च मे ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
आचार्याणां भवन्त्येव रहस्यानि महात्मनाम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
आचार्याणामप्रतिकूलभाषिणो; नित्योत्थिता गुरुकर्मस्वचोद्याः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
आचार्याद्भय़मुत्सृज्य यः प्रेषय़ति सात्यकिम् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
आचार्याश्चाभवंस्तत्र तथा देवर्षय़ोऽपरे ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
आचार्ये निहते द्रोणे धृष्टद्युम्नेन संय़ुगे |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
आचार्येणाभ्यनुज्ञातश्चतुर्णामेकमाश्रमम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यैः सुकृतं गूढैर्दुर्योधनवशानुगैः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
आचार्यो नाभिषक्तव्यः पुरुषेण विजानता |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
आचार्यो न्यासितः शस्त्रं किं तन्न विदितं मम ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
आचार्यो मध्यतस्तिष्ठत्वश्वत्थामा तु सव्यतः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
आचार्यो लघुहस्तत्वादभेद्यकवचावृतः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
आचार्यो वा महावाहो भारद्वाजः किमव्रवीत् ||
७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
आचार्यो वा महेष्वासः कृपो वा सुमहावलः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
आचार्यो विदुरः क्षत्ता शममेव वदिष्यतः |
४५ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यो वृष्णिवीराणां पाण्डवानां च यो द्विजः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
आचार्यो व्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
आचार्यो हि कृती द्रोणः परमास्त्रे कृतश्रमः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
आचार्यो हि भृशं राजन्निग्रहे तव गृध्यति |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
आचार्यो हि सुसंय़त्तो भृशं यत्ताश्च पाण्डवाः |
२० क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
आचार्योपनिधिश्चैव वत्स्यते तदनन्तरम् |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
आचितं समपश्याम श्वाविधं शललैरिव ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
आचिनोद्वहुधा राजन्भग्नदंष्ट्रमिव द्विपम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २०८
वैशम्पाय़न उवाच
आचीर्णानि तु यान्यासन्पुरस्तात्तु तपस्विभिः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
आच्छन्नः स तु वासोभिर्जीवन्निव नरर्षभः |
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
आच्छाद्य च महावाहुर्धनतृष्णामपानुदत् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
आच्छाद्य सुहृदां वाक्यैर्मनोज्ञैरभिनन्दिताः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
आच्छादय़द्दिशः सर्वा धाराभिरिव तोय़दः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
आच्छादय़न्दिशः सर्वाः सूर्यस्येवांशवस्तदा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
आच्छादय़सि प्रावारानश्नासि पिशितोदनम् |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
आच्छादय़सि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
आच्छादय़ित्वा दूतांस्तान्मन्त्रिणः सोऽभ्यचोदय़त् ||
२२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
आच्छादय़ेतां संरव्धौ सिंहनादं च नेदतुः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
आच्छादय़ेतामन्योन्यं तितक्षन्तौ रणेषुभिः ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
आच्छिद्य धार्तराष्ट्रेभ्यो भुङ्क्ष्व यौधिष्ठिरीं श्रिय़म् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
आच्छिद्य रथपन्थानमुत्क्रोशन्तो महारथाः |
२ क