द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घाश्च विद्याधरमहोरगाः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घाश्च समीय़ुस्ते दिदृक्षय़ा ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घाश्च सम्पेतुर्वै समन्ततः |
११५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
सिद्धचारणसङ्घुष्टं रम्यं पुष्पितकाननम् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धदेवर्षिदय़ितं नाम्ना वदरपाचनम् ||
४४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सिद्धदेवर्षिसङ्घाश्च चारणाश्चैव तुष्टुवुः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
सिद्धमन्नं तय़ा क्षिप्रं वलिमन्त्रोपवृंहितम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
सिद्धमन्नमिति प्रह्वो निर्विकारो न्यवेदय़त् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सिद्धमेव महाराज भुञ्जते तत्र नित्यदा ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धर्षिचारणपथं जगामाथ वराप्सराः ||
५३ ग
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
सिद्धविघ्नकरी चापि रौद्रा शूर्पणखा तथा ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धविप्रनिवासैश्च समन्तादभिसंवृतः ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
सिद्धसङ्घपरिज्ञातं पुराकल्पं सनातनम् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
सिद्धा देवर्षय़श्चैव साध्या देवगणास्तथा ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
सिद्धा हि यद्यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात् |
७९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
सिद्धा ह्येते महाभागा नरा ह्येकान्तिनोऽभवन् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
सिद्धानां चैव संवादं मनोश्चैव प्रजापतेः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
सिद्धानां देवतानां च यदा परिमिता गतिः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
सिद्धान्नाद्वैश्वदेवं वै कुर्यादग्नौ यथाविधि |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सिद्धार्थः सर्वभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यव्रतः शुचिः |
१४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्छन्दोव्याकरणोत्तरः |
१०८ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धार्था वसुमन्तश्च सा त्वं प्रीतिमवाप्नुहि ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
सिद्धार्थाश्च सुराः सर्वे प्राप्यामृतमनुत्तमम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सिद्धाश्च मुमुचुर्वाचः साधु साध्विति भारत ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
सिद्धाश्चैते महाभागाः पुरा ह्येकान्तिनोऽभवन् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
सिद्धास्तपोव्रतपराः समागम्य पुरा विभुम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
सिद्धिं च देवीं वरुणस्य पत्नीं; तेजश्च कृत्स्नं सुमहच्च धैर्यम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
युधिष्ठिर उवाच
सिद्धिं च परमां प्राप्तस्तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
सिद्धिं परामभिप्रेक्ष्य शृणु तन्मे जनार्दन ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
सिद्धिं प्राप्तो यथा व्रह्म तथाप्नोति निवोध मे |
५० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धिं प्राप्तोऽसि परमां यथा नान्यः पुमान्क्वचित् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सिद्धिं समभिसम्प्राप्ताः पुण्येन महतान्विताः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
सिद्धिः प्रत्यक्षरूपा च दृश्यत्यागमनिश्चय़ात् ||
४० ग
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धिः प्राप्ता त्वय़ा राजँल्लोकाश्चाप्यक्षय़ास्तव ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
सिद्धिक्षेत्रमिदं पुण्यमय़मेवाश्रमो महान् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
सिद्धिमाप्नुहीति ||
१६४ 6
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धिर्धृतिश्च ये देव्यौ पञ्चानां मातरौ तु ते |
९८ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
सिद्धिर्वाप्यथ वासिद्धिरप्रवृत्तिरतोऽन्यथा ||
४७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
उमो उवाच
सिद्धिवादेषु संसिद्धास्तथा वननिवासिनः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
सिद्धेः फलं च मोक्षश्च दुःखस्य च विनिर्णय़ः |
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
सिद्धेनौषधय़ोगेन सर्वशत्रुविनाशिना |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
सिद्धैर्व्रह्मर्षिभिश्चैव समन्तात्परिवारितम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धो वा यदि वा देवो गन्धर्वो वाथ गुह्यकः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सिद्धोऽस्मीति मतिं चक्रे ततस्तं मान आविशत् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
सिद्धौ प्रय़तमानानां नैवाण्डमुपजाय़ते ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सिद्धय़ोगापहारी च सिद्धः सर्वार्थसाधकः |
६९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
सिध्यतेऽत्र महावाहो यो नरो जाय़ते पुनः ||
५१ ख