chevron_left  आज्ञप्तस्त्वथarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
आज्ञप्तस्त्वथ कृष्णेन दारुको राजसत्तम |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञा तव हि राजेन्द्र कार्या पुत्रैः सहान्वय़ैः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
युधिष्ठिर उवाच
आज्ञा शास्त्रस्य घोरेय़ं न शक्तिं समवेक्षते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
आज्ञा सदाप्रतिहता जय़शव्दो भवत्यथ |
८७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
भीमसेन उवाच
आज्ञां तु शिरसा विभ्रदेष गच्छामि मा शुचः |
४४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञां प्रत्यहरच्चापि कृतकैः पुरुषैः सदा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह वन्धुभिः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापिते तदा योगे समहृष्यन्त सैनिकाः ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
आज्ञाप्य पृथिवीं सर्वां स्थित्वा मूर्ध्नि च सञ्जय़ |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञाप्य सर्वान्नृपतीन्भुक्त्वा चेमां वसुन्धराम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
आज्ञाप्या हि वय़ं सर्वे तव पुत्रास्तपोधने ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
आज्ञापय़ किं करवाणीति ||
११६ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़ किमेतेभ्यः प्रदेय़ं दीय़तामिति |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
आज्ञापय़ कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
आज्ञापय़ कुरुश्रेष्ठ सर्वशस्त्रभृतां वर |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़ महावाहो सर्वं कर्तास्म्यसंशय़म् |
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
नाग उवाच
आज्ञापय़ यथा स्वैरं किं करोमि प्रिय़ं तव ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
आज्ञापय़च्च राक्षस्या मागधेषु महोत्सवम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
आज्ञापय़त राज्ञश्च वलं मित्रवलं तथा |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
आज्ञापय़तु भवान् |
२८ 5
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
आज्ञापय़तु भवान् |
९७ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़त्तदा राजा युय़ुत्सुर्भीमकर्मभिः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
आज्ञापय़त्सोऽप्सरसस्त्वष्टृपुत्रप्रलोभने ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़ध्वमिष्टानि प्रीय़ामो दर्शनेन वः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
आज्ञापय़न्तो राज्ञस्तान्योगः प्रागुदय़ादिति ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़स्व नः पार्थ प्रह्वान्प्रेष्यानवस्थितान् |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़स्व मां मातः कर्तव्यं हि प्रिय़ं तव ||
२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़ामास ततः सेनां भरतसत्तमः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
आज्ञापय़ामास तदा गोमाय़ुर्वध्यतामिति ||
५४ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़ामास तदा तीर्थय़ात्रामरिन्दम ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
आज्ञापय़ामास तदा रथो मे कल्प्यतामिति ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८
सूत उवाच
आज्ञापय़ामास तदा वाला भूत्वाञ्जनप्रभाः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
आज्ञापय़ामास नृपः क्रतुराजप्रवर्तनम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
आज्ञाय़मानेऽपि धनञ्जय़ेन; महाहवे सम्प्रसक्ते नृवीर |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
आज्यं च सलिलं चक्रे भागांश्च त्रिदिवौकसाम् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
उमो उवाच
आज्यधूमोद्भवो गन्धो रुणद्धीव तपोवनम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
आज्यभागेन वै तत्र तर्पितास्तु यथाविधि |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
आज्यवन्मन्त्रवच्चापि सोऽजुहोद्भृगुनन्दन ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
आज्यशेषं पिवन्त्येते हविः प्राश्नन्ति चाध्वरे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
आज्यहोमः समिद्धेऽग्नौ प्राय़श्चित्तं विधीय़ते ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
आज्यानि यजमानेभ्यस्तथान्नाद्यानि भारत |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९७
वैशम्पाय़न उवाच
आज्यावसिक्ता ज्वलिता धिष्ण्येष्विव हुताशनाः |
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
आज्याहुतिं विना चैव यत्किञ्चित्परिविष्यते |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
आज्याहुतिमहाज्वालैर्यज्ञवाटोऽग्निभिर्यथा ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
आज्येन तर्पय़ित्वाग्निं विधिवत्संस्कृतेन ह |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
आज्येन पय़सा दध्ना पूर्णाहुत्या विशेषतः |
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
आज्येन पय़सा दध्ना शकृतामिक्षय़ा त्वचा |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
आटरूषकपुष्पाभा हय़ाः पाण्ड्यानुय़ाय़िनाम् |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
आडम्वरान्गोमुखांश्च डिण्डिमांश्च महास्वनान् ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
आडम्वराश्च शङ्खाश्च दुन्दुभ्यश्च महास्वनाः ||
४ ख