शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
आत्मवृद्धिर्मित्रवृद्धिर्मित्रमित्रोदय़स्तथा |
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मव्यवस्थानकरा गीताः श्लोका महात्मना ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
भीष्म उवाच
आत्मशीलानुमानेन न विश्वसिति कस्यचित् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मशुक्रादपि पृथे मनुः स्वाय़म्भुवोऽव्रवीत् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
आत्मसंरक्षणं सङ्ख्ये गमनं चार्जुनं प्रति |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तय़ेत् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
आत्मसंय़मनं वुद्ध्या परवुद्ध्यावतारणम् |
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
आत्मसंय़मय़ोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
आत्मसम्भाविताः स्तव्धा धनमानमदान्विताः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
आत्मसम्भावितान्विप्रान्स्थापय़ाम्यात्मनो वशे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
आत्मसम्भावितो मूढस्तं प्रमथ्नीत माचिरम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
आत्मसिद्धिस्तु विज्ञाता जहाति प्राय़शो वलम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
आत्मसिद्धिस्तु वेदेषु प्रोच्यते दशभिः क्रमैः ||
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
आत्मस्थमात्मना तेन दृष्टमाय़तनं मय़ा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
आत्मस्वमिव संरक्षेद्राजस्वमिह वुद्धिमान् ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
आत्महा च पुमांस्तात न लोकाँल्लभते शुभान् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
आत्महेतोः परार्थे वा नर्महास्याश्रय़ात्तथा |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मा च परमो वक्तुं नमस्ते नलिनेक्षण ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
आत्मा च पृथिवी चेय़मेकतश्च धनञ्जय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
आत्मा च याति क्षेत्रज्ञं कर्मणी च शुभाशुभे |
९० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मा च रक्ष्यः सततं भोजनादिषु भारत ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
आत्मा च सर्वभूतानां शुक्लो नाराय़णस्तदा ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
आत्मा च सर्वभूतानां साङ्ख्ये पुरुष उच्यसे ||
१५४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
आत्मा चैभिः समाय़ुक्तः सुखदुःखमुपाश्नुते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
आत्मा चैषामग्रतो नातिवर्ते; देवंवृत्तिर्वर्धते भूमिपालः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
आत्मा जेय़ः सदा राज्ञा ततो जेय़ाश्च शत्रवः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
आत्मा तु सर्वतो रक्ष्यो दारैरपि धनैरपि ||
१७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
आत्मा देशश्च कालश्चाप्युपाय़ाः कृत्यमेव च |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
आत्मा धर्मः श्रुतं वेदाः पितरश्च महर्षिभिः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
माद्र्यु उवाच
आत्मा न वारितोऽनेन सत्यं दिष्टं चिकीर्षुणा ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्था; सत्योदका धृतिकूला दमोर्मिः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मा पुत्रः सखा भार्या कृच्छ्रं तु दुहिता किल |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात्तेनेहासि पराजितः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पुत्र उवाच
आत्मा पुत्रः स्मृतस्तस्मात्त्राह्यात्मानमिहात्मना ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
आत्मा पुत्रस्तु विज्ञेय़स्तस्यानन्तरजश्च यः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
आत्मा फलति कर्माणि नाश्रमो धर्मलक्षणम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
आत्मा भुवनभर्तेति सान्वय़ेषु द्विजातिषु ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
आत्मा रक्ष्यो रणे तात सर्वावस्थास्वरिन्दम |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
आत्मा राज्यं धनं चैव कलत्रं वाहनानि च |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
आत्मा रुद्रो हृदय़े मानवानां; स्वं स्वं देहं परदेहं च हन्ति |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
आत्मा वै शक्यते त्रातुं कर्मभिः शुभलक्षणैः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मा हि जाय़ते तस्यां तस्माज्जाय़ा भवत्युत |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
आत्मा हि नौ स विज्ञेय़स्ततस्तं पूजय़ावहे ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मा हि पुरुषव्याघ्र ज्ञेय़ो विष्णुरिति स्थितिः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
मरुत्त उवाच
आत्मा हि मे प्रव्यथते मुहुर्मुहु; र्न मे स्वास्थ्यं जाय़ते चाद्य विप्र ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
आत्मा ह्येवात्मनो ह्येकः कोऽन्यस्त्वत्तोऽधिको भवेत् |
१०० क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मात्मनैव जनितः पुत्र इत्युच्यते वुधैः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
आत्मानं कारणं ह्यत्र त्वमाख्यासि भुजङ्गम ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
आत्मानं घातय़ेत्पश्चात्कर्मेदं नस्तथाविधम् ||
१२ ख