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द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
आकर्षन्तः शरीराणि शरीरावय़वांस्तथा |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
आकर्षन्निव चाभासि पक्षवातेन खेचर ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५६
विदुर उवाच
आकर्षस्तेऽवाक्फलः कुप्रणीतो; हृदि प्रौढो मन्त्रपदः समाधिः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
आकर्षान्मण्डलीभूतं शक्रचापमिवापरम् |
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
आकर्षेतां तथान्योन्यं जानुभिश्चाभिजघ्नतुः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
आकाङ्क्षन्ते च दौहित्रानपि नित्यं पितामहाः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
आकारं गुरुपत्न्यास्तु विज्ञाय़ स भृगूद्वहः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
आकारं गूहमाना च मन्युनाभिसमीरिता |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
आकारं रक्षमाणस्तु न स तान्समुदैक्षत ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
आकारमभिरक्षन्ती प्रतिज्ञां धर्मसंहिताम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
आकारवन्तः सुश्लक्ष्णाः पञ्चशीर्षा इवोरगाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
आकारेणैव तं ज्ञात्वा पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः |
२ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
आकाश इव भूतानि व्याप्य सर्वाणि भारत |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
आकाशं घ्नन्स्रुवः पातै रोषादश्रूण्यवर्तय़त् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
आकाशं चाप्यहङ्काराद्वाय़ुराकाशसम्भवः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
जनमेजय़ उवाच
आकाशं जगती चैव ये च शेषा दिवौकसः ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
आकाशं जाय़ते तस्मात्तस्य शव्दो गुणो मतः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
आकाशं तु वनाभ्याशे मन्यन्ते गुणवत्तरम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
आकाशं पवनोऽभ्येति ज्योतिस्तमनुगच्छति |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
आकाशं पूरय़ामास शरैः संनतपर्वभिः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
आकाशं पृथिवीं ज्योतिर्वाय़ुं सलिलमेव च |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
आकाशं प्रथमं भूतं श्रोत्रमध्यात्ममुच्यते |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
आकाशं मारुतो ज्योतिरापः पृथ्वी च पञ्चमी |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
आकाशं युज्यते येन ततस्तिष्ठत्यसंवृतम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
आकाशं वाय़ुरूष्मा च स्नेहो यच्चापि पार्थिवम् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
आकाशं संवृतं वीरावुल्काभिरिव चक्रतुः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
आकाशं समवस्तीर्य प्रववर्ष सुरेश्वरः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
आकाशग इवाकाशे गन्धर्वनगरोपमः |
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
इन्द्र उवाच
आकाशगं त्वां मद्दत्तं विमानमुपपत्स्यते ||
१३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
आकाशगङ्गा राजेन्द्र तत्राप्लुत्य गमिष्यसि ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
आकाशगमने चैव सुखिताहं त्वय़ा सुखम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
आकाशजं शव्दमाहुरेभिर्वाय़ुगुणैः सह |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
आकाशदेशमासाद्य विमुक्तं कृष्णवर्त्मना |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
आकाशनिधिरूपश्च निपाती उरगः खगः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
आकाशनीकाशतटां नीपनीवारसङ्कुलाम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
आकाशप्रभवः शव्दो गन्धो भूमिगुणः स्मृतः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
आकाशभूतश्चाकाशे सवर्णत्वात्प्रणश्यति ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
आकाशमप्यतिनदन्मनो ग्रसति चारिकम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
आकाशमभिदुद्राव जग्राह विषय़ं ततः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
आकाशमसृजच्चोर्ध्वमधो भूमिं च नैरृतिम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
आकाशमिति विख्यातं सर्वभूतधरः प्रभुः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
आकाशमुत्तमं भूतमहङ्कारस्ततः परम् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
आकाशसङ्काशमसिं गृहीत्वा; पोप्लूय़मानः खगवच्चचार ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भृगुरु उवाच
आकाशसदृशा ह्येते भिद्यन्ते तत्त्वदर्शनात् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
आकाशस्था ध्रुवं यत्र दोषं व्रूय़ुर्विपश्चिताम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७६
भृगुरु उवाच
आकाशस्थानमासाद्य प्रशान्तिं नाधिगच्छति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
आकाशस्य गुणं शव्दमभिव्यक्तात्मकं मनः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २४७
भीष्म उवाच
आकाशस्य गुणः शव्दो व्यापित्वं छिद्रतापि च |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
आकाशस्य गुणो घोषः श्रोत्रेण स तु गृह्यते |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
आकाशस्य तदा घोषं तं विद्वान्कुरुतेऽऽत्मनि |
१४ क