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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
आत्ताय़ुधः सुसङ्क्रुद्धो युय़ुधानो महारथः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
आत्ताय़ुधस्योत्तमवाणपाणे; श्चक्राय़ुधस्याप्रतिमस्य युद्धे ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
आत्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रः परेभ्यः; प्रव्राजिते विदुरे दीर्घदृष्टौ ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
आत्मकार्यगरीय़स्त्वाद्राजा दुर्योधनोऽव्रवीत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
आत्मकेवलतां प्राप्तस्तत्र गत्वा न शोचति |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
आत्मगात्रोष्मसम्भूतैः स्नेहगर्भैस्तिलैरपि |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ३
द्रौपद्यु उवाच
आत्मगुप्ता चरिष्यामि यन्मां त्वमनुपृच्छसि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते नार्यो मन्मथचोदिताः |
६० क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते युगान्ते पर्युपस्थिते ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
आत्मच्छाय़ाकृतीभूतं तेऽपि संवत्सराय़ुषः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
आत्मजं जनय़ामास माधवीपुत्रमष्टकम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
आत्मजं पुत्रमुत्पाद्य यस्त्यजेत्कारणान्तरे |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
आत्मजन्मोद्भवां तात जिह्वावर्तां दुरासदाम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मजस्य ततस्तस्य घृणिनः सत्यसङ्गिनः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २५
भीष्म उवाच
आत्मजां रूपसम्पन्नां महतीं सदृशे वरे |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मजांस्तेन धर्मेण श्रुत्वा शूरान्निपातितान् |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मजान्क्षत्रधर्मेण सम्प्रदाय़ यमाय़ वै ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
आत्मजावात्मसम्पन्नौ यमौ चोभौ यथाश्विनोः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मजेषु परं स्नेहं सर्वभूतानि कुर्वते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
आत्मज्ञानं तितिक्षा च धर्माः साधारणा नृप ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं न सत्याद्विद्यते परम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं परं सत्यव्रतं व्रतम् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४१
व्यास उवाच
आत्मज्ञानं शमश्चैव पर्याप्तं तत्पराय़णम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
आत्मज्ञानमनाय़ासस्तितिक्षा धर्मनित्यता |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
आत्मज्ञानमिदं गुह्यं सर्वगुह्यतमं महत् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मज्ञानमिदं ज्ञानं ज्ञात्वा पञ्चस्ववस्थितम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
आत्मज्ञानि विशिष्टानि जन्माजन्मोपधारणात् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
आत्मतन्त्रोपघातः स न तपस्तत्सतां मतम् |
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
आत्मतन्त्रोपघाती यो न तपस्वी न धर्मवित् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
आत्मतुल्यं मम सुतं प्रय़च्छाच्युत माचिरम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मतुल्यानजनय़त्सहस्रं संशितव्रतान् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
आत्मतृप्त इवासीत वहु चिन्त्यमचिन्तय़न् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
आत्मतेजोद्भवं पार्थ शृणुष्वैकमना मम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
आत्मतेजोभिनिर्वृत्तान्भास्कराग्निसमप्रभान् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
इन्द्र उवाच
आत्मत्यागः सर्वभूतानुकम्पा; लोकज्ञानं मोक्षणं पालनं च |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मत्यागी महाराज स त्यागी तामसः प्रभो ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
आत्मत्यागी ह्यवाग्याति वाच्यतां चाय़शस्करीम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
आत्मत्यागे कृते चेमे मरिष्यन्ति मय़ा विना ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
आत्मत्राणकृतोत्साहास्तावका भरतर्षभ ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
आत्मत्राणपरा भीताः प्राद्रवन्त दिशो भय़ात् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
आत्मत्राणे मतिं कृत्वा प्राद्रवन्कुरवो यथा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
आत्मत्राणे वर्णदोषे दुर्गस्य निय़मेषु च ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणां चापि सत्तमः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मदर्शनसिद्धानामृषीणामृषिसत्तम ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
आत्मदुर्मन्त्रितेनेह मद्वीर्यवशगोऽभवः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
आत्मदोषकृतैर्व्रह्मन्नवस्थां प्राप्तवानिमाम् ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
आत्मदोषांश्च विज्ञाय़ सर्वानात्मनि संश्रितान् |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
आत्मदोषात्त्वय़ा राजन्प्राप्तं व्यसनमीदृशम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
आत्मदोषात्परिभ्रष्टः कथं वक्ष्यामि तानहम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
आत्मदोषात्समुत्पन्नं शोचितुं नार्हसे नृप |
९ क