उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
न हि मार्दवसाध्योऽसौ पापवुद्धिर्मतो मम ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न हि मुक्तस्य मुक्तेन ज्ञस्यैकत्वपृथक्त्वय़ोः |
१७६ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मुच्येत जीवन्मे पदा भूमिमुपस्पृशन् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
न हि मृत्युं तथा राजा श्रुत्वा वै सोऽन्वतप्यत |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
न हि मृत्युं महेष्वासा गणय़न्ति महारथाः ||
९५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे कश्चिदन्योऽस्ति वैश्वासिकतरस्त्वय़ा |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
न हि मे कुरुते काममित्यहं तमुपागमम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
न हि मे केनचिद्देय़ो वरः पाण्डवनन्दन |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
न हि मे जाय़ते त्रासो दृष्ट्वा सैन्यान्यनेकशः |
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
न हि मे जीवितेनार्थस्तानृते पुरुषर्षभान् |
३३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे जीवितेनार्थो न राज्येन धनेन वा |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतो युद्धमुत्तमम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
युधिष्ठिर उवाच
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतोऽमृतमुत्तमम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे त्वत्समः कश्चिद्वरो जातु भविष्यति ||
४९ ख
विराट पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे दृष्टपूर्वस्त्वं तत्त्वं व्रूहि नरर्षभ ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
दुर्योधन उवाच
न हि मे निर्जितस्यास्ति जीवितेऽद्य स्पृहा विभो ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
न हि मे पाण्डवात्कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
न हि मे मन्युरद्याप्युपशमं गच्छति |
१३१ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे मर्षणीय़ोऽय़मर्जुनस्य व्यतिक्रमः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे मुच्यते कश्चित्कथञ्चिद्ग्रहणं गतः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
न हि मे मोक्ष्यते कश्चित्परेषामिति चिन्तय़े |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे मोक्ष्यते जीवन्मूढः सैन्धवको नृपः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
न हि मे मोक्ष्यसे जीवन्यदि नोत्सृजसे रणम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
न हि मे मोक्ष्यसे जीवन्यदि नोत्सृजसे रणम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
न हि मे मोक्ष्यसे जीवन्यदि नोत्सृजसे वधूम् ||
३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
न हि मे युध्यमानस्य साय़कांश्चास्यतः शितान् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
भीम उवाच
न हि मे राक्षसा भीरु सोढुं शक्ताः पराक्रमम् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
न हि मे वर्तते वुद्धिर्गन्तुं व्रह्मन्वृहस्पतिम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
न हि मे विक्रमे तुल्यः कश्चिदस्ति पुमानिह |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे विक्रमे तुल्यः पुमानस्तीह कश्चन |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
न हि मे विद्यते सूत जीवितेऽद्य प्रय़ोजनम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
कर्ण उवाच
न हि मे वृजिनं किञ्चिद्धार्तराष्ट्रा विदुः क्वचित् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
न हि मे वृजिनं किञ्चिद्विद्यते व्राह्मणेष्विह |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
न हि मे व्राह्मणो वध्यः पापेष्वपि रतः सदा ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
न हि मे शान्तिरस्तीह युधि देवव्रतं हतम् |
६९ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे शाम्यते दुःखं कर्णो यत्प्राहसत्तदा ||
११३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
न हि मे शाम्यते वैरं कृष्णां यत्प्राहसत्पुरा ||
८० ग
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
न हि मे शुध्यते भावः कदाचिद्विनशेदिति ||
१६ ग
वन पर्व
अध्याय
१५७
जनमेजय़ उवाच
न हि मे शृण्वतस्तृप्तिरस्ति तेषां विचेष्टितम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
न हि मे संय़ुगे कश्चित्सोढुमुत्सहते वलम् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि मेऽन्यद्भवेच्छ्रेय़ो वनाभ्युपगमादृते |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
न हि मोक्ष्यति पार्थात्स प्रविष्टोऽप्यमरावतीम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
न हि मोघः शरः कश्चिदासीद्भीष्मस्य संय़ुगे |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
न हि यज्ञसमं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ||
५१ ग
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि यज्ञसमारम्भः केवलात्मविपत्तय़े |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि यज्ञे पशुगणा विधिदृष्टाः पुरन्दर ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
न हि यज्ञो महानेष सदृशस्तैर्मतो मम ||
८९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
न हि यत्र महावाहुर्वासुदेवो व्यवस्थितः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
न हि याचन्ति राजान एष धर्मः सनातनः |
९ क