शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
आत्मनात्मनि सम्पश्येत्किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||
१३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
आत्मनात्मानमन्विच्छेन्मनोवुद्धीन्द्रिय़ैर्यतैः |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
आत्मनात्मानमास्थाय़ दृष्ट्वा चात्मानमात्मना ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
आत्मनानर्थय़ुक्तेन पापे निविशते मनः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
आत्मनापञ्चमोऽय़ुध्यं पाञ्चालस्य वलेन ह |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
आत्मनामाङ्कितान्वाणान्राधेय़ः प्राहिणोच्छितान् ||
२४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
आत्मनाष्टम इत्येव श्रुतिरेषा परा नृषु |
११८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
आत्मनिःश्रेय़सं सर्वे प्राप्तकालं महावलाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
आत्मनिःश्रेय़सज्ञाने धीरं निश्चितनिश्चय़म् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२५
शल्य उवाच
आत्मनिन्दात्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
आत्मनिन्दात्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
आत्मनीष्टे तथानिष्टे रिपौ च समता तथा |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
आत्मनैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
आत्मनैव सहाय़ेन यश्चरेत्स सुखी भवेत् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
आत्मनैव हतः पापो यः पापं कर्तुमिच्छति ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनो जन्मनः क्षेत्रं पुण्यं रामाः सनातनम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
आत्मनो दर्शनं विद्वन्नाहन्तास्मीति मा क्रुधः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
आत्मनो ध्याय़िनस्तात ज्ञानमेतदनुत्तमम् ||
२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
आत्मनो नाभिजानीते क्व मे पुष्पं क्व मे फलम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
आत्मनो निग्रहस्त्यागोऽथार्थदूषणमेव च ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
आत्मनो मतमुत्सृज्य तं लोकोऽनुविधीय़ते ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनो मतमुत्सृज्य स लोके सुखमेधते ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
आत्मनो मरणं जानन्वाध्रीणस इव द्विपः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
आत्मनो महतो वेद यः पुण्यां गतिमुत्तमाम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
आत्मनो मांसमुत्कृत्य कपोततुलय़ा धृतम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनो मृगशापेन जानन्नुपहतां क्रिय़ाम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
आत्मनो लघुतां कृत्वा वभूव मृगचारिणी ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
आत्मनो वन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
आत्मनो वलमज्ञात्वा तदन्तं तस्य जीवितम् ||
७४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
आत्मनो वलमज्ञाय़ धर्मार्थपरिवर्जितम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
आत्मनो वलमाज्ञाय़ तत एनमुवाच ह ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
आत्मनो विल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यसि ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
आत्मनो वुद्धिदौर्वल्याद्भीष्ममासाद्य केशव |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
आत्मनो वुद्धिदौर्वल्याद्भीष्ममासाद्य संय़ुगे ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
आत्मनो हन्त गच्छामि त्वादृशे नास्ति सङ्गतम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनो हि वय़ं दोषाद्विनष्टाः शाश्वतीः समाः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
आत्मनो ह्यपराधेन महद्व्यसनमीदृशम् |
२० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनोऽतिक्रमं पश्य पुत्रस्य च दुरात्मनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
आत्मनोऽध्रुवतां पश्यंस्तांस्त्वं किमनुशोचसि |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
आत्मनोऽर्थे त्वय़ा लोको यत्नतः सर्व आहृतः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१३
पितर ऊचुः
आत्मनोऽर्थेऽस्मदर्थे च धर्म इत्येव चाभिभो ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
आत्मनोऽर्धं च तस्याग्निः सोमोऽर्धं पुनरुच्यते ||
९५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
आत्मनोऽर्धं तु तस्याग्निरुच्यते भरतर्षभ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
आत्मनोऽव्ययिनो ज्ञात्वा इदं पुत्रानुशासनम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य त्यक्त्वा सर्वपरिग्रहान् ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
आत्मन्यपि च मित्रेषु विपरीतं यदा भवेत् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
आत्मन्यपि न विश्वासस्तावान्भवति सत्सु यः |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
आत्मन्यात्मानमाधाय़ निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ||
५२ ख