chevron_left  आत्मन्यात्मानमाधाय़arrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मन्यात्मानमाधाय़ वीरा मूलफलाशनाः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
आत्मन्यात्मानमावेश्य व्रह्माणं समुपासते ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
आत्मन्येव भविष्यामि न मां तारय़ति प्रजा ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आत्मन्येव हि सन्दृश्यावुभौ जय़पराजय़ौ |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
आत्मन्येवात्मना जात आत्मनिष्ठोऽप्रजोऽपि वा |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
आत्मन्येवात्मनात्मानं यथा त्वमनुपश्यसि |
१२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
आत्मन्येवात्मनो भावं समासज्याटति द्विजः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
आत्मन्येवात्मसात्कृत्वा जगदास्से परन्तप ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
आत्मपूजाभिकामा वै को वसेत्तत्र पण्डितः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
कर्ण उवाच
आत्मप्रच्छादनार्थं वै वाहुवीर्यमुपाश्रितः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
आत्मप्रतिष्ठिता प्रज्ञा मम नास्ति ततोऽन्यथा ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुधेय़ं वसुन्धरा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुधैव वसुन्धरा ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
आत्मप्रत्ययिकं शास्त्रमिदं पुत्रानुशासनम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २९०
सूर्य उवाच
आत्मप्रदानं कुरु कुन्तिकन्ये; शान्तिस्तवैवं हि भवेच्च भीरु ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
कुन्त्यु उवाच
आत्मप्रदानं दुर्धर्ष तव कृत्वा सती त्वहम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
आत्मप्रदानं सौम्यत्वमद्भ्यश्चैवोपजीवनम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
आत्मप्रभावात्तं विद्यात्सर्वा ह्यात्मनि देवताः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
आत्मप्रमाण उन्नद्धः श्रेय़सो ह्यवमन्यकः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
आत्मप्रमाणरचिते अपामुपरि कल्पिते |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय ७२
कच उवाच
आत्मप्राणैः प्रिय़तमा भार्गवस्य महात्मनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
आत्मप्राप्तानि च ततो जानन्ति द्विजसत्तमाः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
आत्मभावं तथा स्त्रीषु मुक्तमेव पुनः पुनः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
आत्मभूत महाभूत कर्मात्मञ्जय़ कर्मद ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
आत्मभूतः सदा लोके चरेद्भूतान्यहिंसय़न् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
आत्मभूतैरतद्भूतः सह चैव विनैव च |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
आत्ममांसप्रदानेन शिविरौशीनरो नृपः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
आत्ममांसप्रदानेन शिविरौशीनरो नृपः |
७५ क
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
आत्ममांसानि जुह्वन्तौ पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठितौ |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
आत्ममांसोपवृत्तं च शरीरार्धमय़ीं तनुम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
आत्ममूलमिदं सर्वमाहुर्हि विदुषो जनाः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
आत्ममोक्षनिमित्तं वै यतेत मतिमान्नरः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
आत्मरक्षणमाश्वासः स्पशानां चान्ववेक्षणम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
आत्मरक्षिततन्त्राणां सुपरीक्षितकारिणाम् |
१७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
आत्मरूपगुणानेतान्विविधान्हृदय़प्रिय़ान् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
आत्मवत्तस्य कुर्वीत संस्कारं स्वामिवत्तथा |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
आत्मवत्सर्वभूतेषु यश्चरेन्निय़तः शुचिः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
आत्मवत्सु तपोवत्सु श्रुतवत्सु प्रतिष्ठितः ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
आत्मवद्वै प्रय़ुञ्जीरन्संस्कारं व्राह्मणादय़ः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
आत्मवन्तं न कर्माणि निवध्नन्ति धनञ्जय़ ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
आत्मवन्तमिव व्याधिः पुरुषं वृद्धशीलिनम् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
आत्मवन्धविनिर्मोक्षं स करोत्यचिरादिव ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
आत्मवश्यैर्विधेय़ात्मा प्रसादमधिगच्छति ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
शल्य उवाच
आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि विमुह्यति ||
८७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
व्यास उवाच
आत्मवान्भव सुप्रीतः स्वधर्मचरणे रतः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
आत्मविक्रय़तुल्यास्ताः शाश्वता विद्धि कौशिक ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
आत्मवुद्धिं समास्थाय़ शान्तीभूतो निरामय़ः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
आत्मवृद्धिकरीं नीतिं विदधीत विचक्षणः |
१७ क