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उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानं च कुशलिनं निवेद्याहुरनामय़म् ||
९७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
आत्मानं च कृतात्मानं समीक्ष्य भरतर्षभ |
४५ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
आत्मानं च परं चैव त्राय़ते महतो भय़ात् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४८
नाग उवाच
आत्मानं च विशेषेण प्रशंसाम्यनपाय़िनि |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानं च सहामात्यं सपुत्रपशुवान्धवम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
आत्मानं च स्वपक्षं च पलाय़न्हन्ति संय़ुगे |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
आत्मानं जुहुय़ाद्वह्नौ समिद्धे तेन शुध्यति ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
आत्मानं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
आत्मानं तं विजानीहि सर्वलोकहितात्मकम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानं तक्षति ह्येष वनं परशुना यथा |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जय़ेत् ||
४२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
आत्मानं तद्वदज्ञानादन्यत्वं चैव वेद्म्यहम् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
आत्मानं तारय़ मय़ा कुलं चेमौ च दारकौ ||
३५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानं त्रातुकामेन तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
आत्मानं त्वामात्मनोऽनन्यभावो; विद्वानेवं गच्छति व्रह्म शुक्रम् ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
ऋषभ उवाच
आत्मानं दर्शय़ामास धर्मं धर्मभृतां वरः ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय १०३
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानं दित्सितं चास्मै पित्रा मात्रा च भारत ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
आत्मानं नार्चय़ेत्कश्चिदिति मे भावितं मनः |
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानं परिरक्षस्व त्यक्तव्यां मां च सन्त्यज ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
आत्मानं पातकेभ्यश्च भवाद्य चिरकारिकः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
आत्मानं पीडय़ित्वापि सुहृत्कार्यपराय़णाः |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
आत्मानं पुरतः कृत्वा यान्त्यधः सहपार्थिवाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
आत्मानं पूजय़ित्वैव तत्रैवादर्शनं गतः ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
आत्मानं प्रतिजानाति लोकेऽस्मिन्पुरुषोत्तमम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
आत्मानं प्रविभज्येह लोकानां हितमादधे ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
आत्मानं भवतः शास्त्रे निय़म्य भरतर्षभ ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
आत्मानं मज्जय़ामास विपाशः पुनरुत्थितः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
आत्मानं मन्यते मोहात्तदसम्यक्परं मतम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
आत्मानं मन्यते सर्वो व्येतु ते भय़मागतम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
आत्मानं मन्यमानः सञ्श्रेय़ः किमिह मन्यसे ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
आत्मानं मन्यसे चाथ पापकर्माणमन्ततः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
आत्मानं मोचय़न्तं च तावकाः समपूजय़न् ||
४५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
आत्मानं यः समुद्वध्य कण्ठे वद्ध्वा महाशिलाम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
आत्मानं यूपमुच्छ्रित्य स यज्ञोऽनन्तदक्षिणः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
आत्मानं यूपमुच्छ्रित्य स यज्ञोऽनन्तदक्षिणः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
आत्मानं वहुधा कृत्वा तान्येव च विचक्षते ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
आत्मानं वहुधा कृत्वा येय़ं भूय़ो युनक्ति माम् |
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
काश्यप उवाच
आत्मानं वा कथं युक्त्वा तच्छरीरं विमुञ्चति |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
आत्मानं वा परित्यज्य शत्रून्वा विनिपात्य वै |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
आत्मानं श्रेय़सा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोचनात् ||
८४ ख
वन पर्व
अध्याय ५५
वृहदश्व उवाच
आत्मानं स शपेन्मूढो हन्याच्चात्मानमात्मना |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
आत्मानं सङ्क्रमं कृत्वा कृत्स्नधर्मविदेव सः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
आत्मानं सङ्क्रमं कृत्वा मन्ये धर्मविदेव सः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
आत्मानं सत्यधर्मौ च पालय़ानो महीपते |
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
आत्मानं समरे जघ्नुः स्वानेव च परानपि ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
आत्मानं सर्वकार्याणि तापसे राज्यमेव च |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
आत्मानं सर्वतो रक्षन्राजा रक्षेत मेदिनीम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
आत्मानं सह यास्यावः श्वो वसाद्येह शर्वरीम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
आत्मानं साधय़ेत्तत्र गिरौ कालञ्जरे नृप |
५४ क