शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
स तौ दय़ावान्विप्रर्षिरुपप्रैक्षत दम्पती |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
स त्यक्त्वा सशरं चापं रथाद्भूमिमथापतत् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
स त्यागी सत्यसङ्कल्पः स तु क्षान्तः स ईश्वरः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
स त्रैलोक्यविनाशाय़ कोपाग्निं जनय़िष्यति |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं कथमिहानेन शङ्खशव्देन भीषितः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
स त्वं कर्ण मय़ा सार्धं शूरैश्चान्यैर्महारथैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
स त्वं कवचमास्थाय़ क्रुद्धमद्य रणेऽर्जुनम् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
स त्वं कुरु तथा तात स्वमतेन पितामह |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
स त्वं कुरु महावाहो कर्म युक्तमिहात्मनः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
स त्वं क्षुद्रसमाचारो नीचात्मा पापनिश्चय़ः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
स त्वं गुरुरिति प्रेम्णा मय़ा संमानितो भृशम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
स त्वं गोविन्दवाक्यानि मानय़स्व जय़ैषिणः ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
स त्वं जातवलो राजन्दुष्प्रधर्षः प्रतापवान् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं तातानुपाय़ेन लिप्ससे भरतर्षभ |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
स त्वं ददस्व मां राज्ञे प्रतिगृह्य हय़ोत्तमान् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
स त्वं देव प्रपन्नानां याचतां च दिवौकसाम् |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स त्वं धर्मभृतां श्रेष्ठं राजानं धर्मसंहितम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
स त्वं धर्ममवेक्षस्व त्यक्त्वाधर्ममसाम्प्रतम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं न दुःखी दुःखस्य न सुखी च सुखस्य च |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
स त्वं न दुःखी दुःखस्य न सुखी सुसुखस्य वा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
स त्वं नाराय़णो भूत्वा हरिरासीः परन्तप |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
स त्वं निवृत्तवन्धस्तु निवृत्तश्चापि कर्मतः |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
स त्वं नृपतिशार्दूल न पुत्रं त्यक्तुमर्हसि |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
स त्वं परिवृतः पार्थैर्नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
स त्वं परेषां वीर्येण मन्यसे वीर्यमात्मनः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
स त्वं पश्य महेष्वासं योगीष्वर महारथम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं पुत्रैश्च पौत्रैश्च भ्रातृभिः पितृभिस्तथा |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
स त्वं पुरुषशार्दूल पौरुषे महति स्थितः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
स त्वं पुरुषशार्दूल विक्रम्य जहि कौरवान् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वय़त्नैरिमं प्रभो |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं प्रतिश्रय़ेऽस्माकं पूज्यमानः सुखोषितः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
स त्वं भ्रातुर्वय़स्यस्य गुरोरपि च संय़ुगे |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४३
कुन्त्यु उवाच
स त्वं भ्रातॄनसम्वुद्ध्वा मोहाद्यदुपसेवसे |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं भ्रातॄनिमान्दृष्ट्वा प्रतिनन्दस्व भारत |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
स त्वं मामभिसन्धाय़ भक्ष्यं मृगय़से पुनः ||
१६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं यज्ञैर्महाराज यजस्व वहुदक्षिणैः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
स त्वं येन च कार्येण सम्प्राप्तो भगवानिह ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
स त्वं राजन्स्थिरो भूत्वा दृढां कृत्वा रणे मतिम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
स त्वं राजेन्द्र सञ्जातं शोकमेतन्निवर्तय़ |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं रासभय़ुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
स त्वं रुरुरिति ख्यातः प्रमतेरात्मजः शुचिः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं विद्वन्धर्ममिमं वुद्धिगम्यं कथं नु माम् |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं विरुध्य तैर्वीरैरन्येभ्यस्त्राणमिच्छसि |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
व्यास उवाच
स त्वं वृहस्पतिं गच्छ तमनुज्ञाप्य चाव्रज |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं व्यपेक्षय़ा भ्रातुः सन्तानाय़ कुलस्य च |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
शमीक उवाच
स त्वं शमय़ुतो भूत्वा वन्यमाहारमाहरन् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
स त्वं शीघ्रमितो गत्वा भीष्मस्य शिविरं प्रति |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स त्वं शूरश्च वीरश्च विक्रान्तश्च नरर्षभ |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
स त्वं सन्तानवानद्य पुत्रवानपि च द्विज |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
स त्वं सम्राड्गुणैर्युक्तः सदा भरतसत्तम |
६० क