शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भरद्वाज उवाच
आकाशस्याप्रमेय़त्वाद्वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
आकाशस्येव विप्रर्षे पश्यँल्लोकस्य चित्रताम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
आकाशात्तु विकुर्वाणात्सर्वगन्धवहः शुचिः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
आकाशात्प्राणिनामेते शरीरे पञ्च धातवः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
युधिष्ठिर उवाच
आकाशादपि वा राजन्नप्रमेय़ैव वा पुनः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भीष्म उवाच
आकाशादभवद्वारि सलिलादग्निमारुतौ |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
आकाशानुगतत्वाद्धि दुर्ग्रहः स निराश्रय़ः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
आकाशान्मेदिनीं प्राप्तस्ततः स पृथिवीपतिः |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
आकाशे तिष्ठ तिष्ठेति तस्थौ सूर्यस्य शासनात् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
आकाशे ददृशे ज्योतिरुद्यतार्चिःसमप्रभम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
आकाशे दुन्दुभीनां च वभूव तुमुलः स्वनः ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
आकाशे विद्रुमे पुण्ये प्रस्थे हिमवतः शुभे |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वासुदेव उवाच
आकाशे वृत्रभूते च शव्दे च विषय़े हृते |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
आकाशे समदृश्यन्त खगमानां व्रजा इव ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
आकाशे समदृश्यन्त हंसानामिव पङ्क्तय़ः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
आकाशे समपश्याम पतङ्गानिव शीघ्रगान् ||
७१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
आकाशे समपश्याम पतङ्गानिव शीघ्रगान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
आकाशेनैव योगीशः पुरा त्रिनय़नः प्रभुः ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
आकिञ्चन्यं च राज्यं च तुलय़ा समतोलय़म् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
आकिञ्चन्यं सुखं लोके पथ्यं शिवमनामय़म् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
आकिञ्चन्यं सुसन्तोषो निराशित्वमचापलम् |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
आकिञ्चन्यं सुसन्तोषो निराशीष्ट्वमचापलम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
आकिञ्चन्यमनाशास्यमिति वै नहुषोऽव्रवीत् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
आकिञ्चन्ये च राज्ये च विशेषः सुमहानय़म् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
आकिञ्चन्ये न मोक्षोऽस्ति कैञ्चन्ये नास्ति वन्धनम् |
५० क
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
आकीर्णा वसुधा तत्र शिरोभिश्च सकुण्डलैः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
आकीर्णांस्तोमरांश्चापांश्चित्रान्हेमविभूषितान् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
आकीर्णैराचिता भूमिः शङ्खानामिव राशिभिः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
आकीर्यत रणे भीमः शतशोऽथ सहस्रशः ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
आकुमारं च पौरास्ते चिन्ताशोकसमाहताः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
आकुमारं तदा राजन्नागमत्तत्पुरं विभो |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
आकुमारं नरव्याघ्र तत्पुरं वै समन्ततः |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
आकुमारं पुरं सर्वमभवच्छोककर्शितम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
आकुलत्वात्तु क्रेतॄणामेकान्ते संस्थितो द्विजः ||
१० ग
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
आकुला सा सभा तात भवति स्म सुखप्रदा ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
आकुलाकुलमुत्सृष्टं हृष्टपुष्टजनान्वितम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
आकुलानि च शास्त्राणि हेतुभिश्चित्रितानि च |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
आकुलीकृत्य कौन्तेय़ो जय़द्रथमुपाद्रवत् |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
आकृतिर्व्यक्तिरित्येतौ गुणौ यस्मिन्समाश्रितौ ||
१०७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
आकृष्य राजन्नाकर्णाद्विव्याधोरसि सात्यकिम् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
आकृष्यमाणः कलिना सौहृदेनापकृष्यते ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
आकृष्यमाणा वातेन साश्मचूर्णेन भारत ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्यास्तु विशां पते |
४१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
आक्रन्दं हतवन्धूनां दारुणे वैशसे शृणु ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
आक्रन्दतीमुपश्रुत्य जवेनाभिससार ह ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रन्दद्भीमसेनं वै येन यातो महावलः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रन्दे तत्र कौन्तेय़श्चिन्तय़ामास दुःखितः ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
आक्रमन्तो दिवं भाभिर्धर्मेणावृत्य रोदसी ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
आक्रम्य गतय़ः सूक्ष्माश्चरत्यात्मा न संशय़ः ||
८६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
आक्रम्य तस्थुर्वर्षाणां पूगान्नाम प्रजापतिः ||
१९ ख