वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
आदित्यलोकं व्रजति कुलं चैव समुद्धरेत् ||
१६१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
आदित्यवंशप्रभवस्त्वं हि लोकपरिश्रुतः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
आदित्यवचनाच्चैव जातं मां सा व्यसर्जय़त् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
आदित्यवन्धनं नाम दुर्धर्षमकृतात्मभिः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
आदित्यवन्नाकपृष्ठे रेजुरैरावतोद्भवाः ||
१४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
आदित्यश्चन्द्रमा वाय़ुर्भूमिरापोऽम्वरं दिशः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
आदित्यश्चन्द्रमा वाय़ुर्व्रह्मा प्राणः क्रतुर्यमः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
आदित्यश्चन्द्रमा विष्णुरापो वाय़ुः शतक्रतुः |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
आदित्यश्चन्द्रमाश्चैव नक्षत्राणि ग्रहाश्च ये |
२५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्यसहितो याति पश्यैनं पुरुषर्षभ ||
१३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
आदित्यस्तेजसां श्रेष्ठो गिरीणां हिमवान्वरः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
आदित्यस्य त्विषा तुल्यं वुद्ध्या चोशनसा समम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
आदित्यस्य सुमहान्तः सुवृत्ता; स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
आदित्यस्याश्रमो यत्र तेजोराशेर्महात्मनः ||
१६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
आदित्यस्यैव गोः पुत्रो ज्येष्ठः पुत्रः कृतः स्मृतः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
आदित्या इव दीप्यन्ते तेजसा भुवि मानवाः |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
आदित्या मरुतश्चैव यातुधानाश्च सर्वशः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
आदित्या वसवः साध्या विश्वेदेवास्तथाश्विनौ |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्या वसवो रुद्रा भविष्यन्ति दिवौकसः ||
४२ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनावपि |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतोऽथाश्विनावपि |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
आदित्या वसवो रुद्रा यथा वुद्धिं वृहस्पतेः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्या वसवो रुद्राः ससाध्या मरुदश्विनः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वे च देवताः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
आदित्या वसवो रुद्राः साध्याश्च समरुद्गणाः |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
आदित्या वसवो रुद्राः साश्विनः पितरोऽपि च |
११ क
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्या वसवो रुद्रास्तथा व्रह्मर्षय़ोऽमलाः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
आदित्या वसवो रुद्रास्तथैवाग्न्यश्विमारुताः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
आदित्याः क्षत्रिय़ास्तेषां विशस्तु मरुतस्तथा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
आदित्याः सत्रमासन्त सरो वै मानसं प्रति |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
आदित्याः साधिराजानो नानाद्वन्द्वैरुदाहृताः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
आदित्याज्जाय़ते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
आदित्यानदितिर्जज्ञे देवश्रेष्ठान्महावलान् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
आदित्यानश्विनौ चैव तान्सर्वान्प्रत्यपूजय़म् ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
आदित्यानां भवान्विष्णुर्वसूनां चैव पावकः |
१५८ क
वन पर्व
अध्याय
७९
जनमेजय़ उवाच
आदित्यानां यथा विष्णुस्तथैव प्रतिभाति मे ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्यानां हि सर्वेषां विष्णुरेकः सनातनः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
आदित्यानामधीवासे मोदमानो वसेच्चिरम् |
९७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
आदित्याभिमुखोऽभ्येति गगनं पाटय़न्निव ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
आदित्याविव सन्दीप्तौ लोकक्षय़करावुभौ |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
आदित्याश्चैव रुद्राश्च दिवाकरनिशाकरौ |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
आदित्याश्चैव रुद्राश्च साध्याश्च वसुभिः सह |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्याश्चैव साध्याश्च ये च सप्तर्षय़ो दिवि |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्याश्चैव साध्याश्च वसवोऽथाश्विनावपि |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
आदित्यास्तत्र वरुणं जलेश्वरमुपासते ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
आदित्याय़ुतसङ्काशस्तेजोज्वालावृतो ज्वलन् ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
आदित्ये सवितुर्ज्येष्ठे विवस्वाञ्जगृहे ततः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
आदित्येन च सन्तप्ता भृशं विमनसोऽभवन् ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
आदित्येन यथा व्याप्तं तमो लोके प्रणश्यति |
३८ क