chevron_left  आधय़ोऽभिभविष्यन्तिarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
आधय़ोऽभिभविष्यन्ति त्वदृते पुष्करेक्षण ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
आनकानां च राधेय़ मृदङ्गानां च सर्वशः ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
आनकाश्चाभ्यहन्यन्त स शव्दस्तुमुलोऽभवत् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
आनतेनाथ शूलेन पाणिनामिततेजसा |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
आननैर्विकृतैः पादैः पार्थ वेषैश्च वैकृतैः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
आनन्तर्यं चारभते न प्राणानां धनाय़ते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
आनन्तर्यात्तथा क्षत्रं पृथिवी कुरुते पतिम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
आनन्तर्यात्तु जाय़न्ते तथा वाह्याः प्रधानतः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
आनन्तिकां तां धनितामाहुर्वेदविदो जनाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
आनन्त्यं व्रह्मणः स्थानं व्राह्मणा नाम निश्चय़ः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
आनन्त्यमनुय़ुङ्क्ते यः कर्मणा तद्व्रवीमि ते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
आनन्त्यमुपसम्प्राप्ताः सन्तोषादिति वैदिकम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
आनन्त्याय़ भवेद्दत्तं खड्गमांसं पितृक्षय़े |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
आनन्त्याय़ोपतिष्ठन्ति सर्वतोक्षिशिरोमुखाः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
आनन्दः कर्मणां सिद्धिः प्रतिपत्तिः परा गतिः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३८
व्रह्मो उवाच
आनन्दः प्रीतिरुद्रेकः प्राकाश्यं सुखमेव च |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
आनन्दप्रीतिधारं च कामक्रोधपरिग्रहम् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
आनन्दश्च प्रमोदश्च स्वस्तिको ध्रुवकस्तथा ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
आनन्दय़ति मां भूय़ः सात्यकिः सत्यविक्रमः |
१५७ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
आनर्चुः पुण्डरीकाक्षं परिवव्रुश्च सर्वशः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
आनर्चुर्व्राह्मणाः सर्वे कृष्णश्च सह पाण्डवैः ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
आनर्छतुः शरैर्घोरैस्तक्षमाणौ परस्परम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
आनर्तं च दुराधर्षं शितैर्वाणैरवाकिरत् ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
आनर्तनगरं मुक्तं ततोऽहमगमं तदा |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
आनर्तनगरीं रम्यां जगामाशु धनञ्जय़ः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
आनर्तनगरीं वीरस्तदनुज्ञातुमर्हसि ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
आनर्तमेवाभिमुखाः शिवेन; गत्वा धनुर्वेदरतिप्रधानाः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
आनर्तवासी हृदिकात्मजोऽसौ; महारथः सात्वतानां वरिष्ठः |
९२ क
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
आनर्ताः सत्यमाख्यात तत्र गन्तास्मि यत्र सः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
आनर्तानवलोक्य त्वं पितरं च महाभुज |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
आनर्तानां महाराज प्रद्युम्नो वाक्यमव्रवीत् ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
आनर्तान्कालकूटांश्च कुणिन्दांश्च विजित्य सः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
आनर्तान्पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
आनर्ताश्च तथा सर्वे नटनर्तकगाय़नाः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
आनर्तेभ्योऽपि दाशार्हानभिमन्युं च पाण्डवः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
आनर्तेषु विमर्दं च क्षेपं चात्मनि कौरव |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
आनर्तय़ोधाञ्शतशो निहत्य निहतो रणे ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
आनर्दं नर्दतः सम्यक्तदा सुत्यं भविष्यति ||
४७ ख
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
आनह्य चर्मणा तेन स्थापय़ामास स्वे पुरे |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
आनाहार्तं ततो दृष्ट्वा तत्सैन्यमसुखार्दितम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
आनाय़ितामनार्येण क्रोधलोभानुवर्तिना |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
आनाय़्य कृष्णं दाशार्हं पुनर्मन्त्रममन्त्रय़न् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
आनाय़्य च तथा वीरं राजानं वभ्रुवाहनम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
आनाय़्य भरतं देवी कैकेय़ी वाक्यमव्रवीत् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
आनाय़्य सा तदा तस्मै प्रादादसकृदच्युत ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
आनिनाय़ क्रिय़ार्थेऽग्नीन्यथावद्विहितांस्त्रिधा ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
आनिनाय़ पुनः पार्थः पुत्रांस्ते राजसत्तम ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
आनीता स्वपुरं सीता लोके कीर्तिश्च स्थापिता ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २७६
मार्कण्डेय़ उवाच
आनीतां द्रौपदीं कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् |
९ क